"हमें सोचना होगा हम प्रकृति के साथ हैं या खिलाफ ?
वाराणसी । यह सोचना बेहद ज़रूरी है कि हम प्रकृति के साथ हैं या इसके खिलाफ। सच्चाई यह है कि हमारा अस्तित्व प्रकृति पर ही निर्भर है। जब हम प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर चलते हैं, तो जीवन खुशहाल रहता है। इसके विपरीत, इसके खिलाफ जाने से विनाशकारी परिणाम सामने आते हैं। मनुष्य प्रकृति से अलग नहीं, बल्कि उसी का एक अभिन्न हिस्सा है।
इसलिए, प्रकृति को नुकसान पहुँचाना अंततः स्वयं को नुकसान पहुँचाना है।आदिकाल से ही मानव प्रकृति की गोद में पलता आया है। लेकिन हाल के दशकों में, आधुनिक विकास और मशीनीकरण के अंधाधुंध उपयोग ने प्रकृति का भारी शोषण किया है, जो इसके खिलाफ जाने का सबसे बड़ा उदाहरण है।जब हम प्रकृति के संपर्क में आते हैं, तो हमें गहरा मानसिक सुकून मिलता है। यह हमें धैर्य, शांति और संतुलन बनाए रखने की अमूल्य सीख देती है। प्राकृतिक संसाधनों का सही उपयोग और संरक्षण करके ही हम पृथ्वी पर एक सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित कर सकते हैं।
मनुष्य के रूप में हमारा कर्तव्य है कि हम प्रकृति को एक शत्रु या सिर्फ उपयोग की जाने वाली वस्तु के रूप में न देखें, बल्कि उसे अपनी सहचरी और जीवन का आधार समझें ।। रविन्द्र गुप्ता
