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रथयात्रा विवाद के पीछे छिपी बड़ी बहस: परंपरा बनाम वैश्विक विस्तार, आमने-सामने SJTA और ISKCON
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  • 151168597 - RAJESH SHIVHARE 34 54
    04 Jun 2026 15:25 PM



 

  • जगन्नाथ रथयात्रा पर बढ़ा विवाद, तिथियों से आगे धार्मिक अधिकार की बहस तेज
  • पुरी मंदिर प्रशासन बनाम इस्कॉन: रथयात्रा विवाद ने खड़े किए बड़े सवाल
  • जगन्नाथ संस्कृति के वैश्विक विस्तार पर टकराव, आमने-सामने SJTA और इस्कॉन
  • रथयात्रा की तारीख या धर्म विस्तार की लड़ाई? गहराया पुरी-इस्कॉन विवाद
  • जगन्नाथ परंपरा और वैश्विक वैष्णव आंदोलन के बीच बढ़ी खींचतान
  • रथयात्रा विवाद के बहाने उठा बड़ा सवाल: जगन्नाथ संस्कृति का भविष्य किसके हाथ?

जगन्नाथ रथयात्रा और स्नानयात्रा की तिथियों को लेकर पुरी श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन यानी एसजेटीए और अंतरराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ, इस्कॉन के बीच विवाद गहराता जा रहा है। हालांकि जानकारों का मानना है कि यह विवाद केवल तारीखों के मतभेद तक सीमित नहीं है, बल्कि जगन्नाथ संस्कृति के वैश्विक प्रसार, धार्मिक परंपराओं की व्याख्या और आध्यात्मिक अधिकार जैसे व्यापक मुद्दों से जुड़ा हुआ है।

इस्कॉन इंडिया स्कॉलरशिप बोर्ड के कन्वेनर कृष्णा कीर्ति दास के अनुसार, 1966 में स्थापित इस्कॉन ने 1967 से विदेशों में रथयात्राओं का आयोजन शुरू किया था। पहले सैन फ्रांसिस्को और बाद में लंदन सहित दुनिया के कई शहरों में रथयात्राएं निकाली गईं। इनमें से कुछ आयोजन पुरी मंदिर के पारंपरिक पंचांग से अलग तिथियों पर भी हुए।

पुरी मंदिर प्रशासन का कहना है कि ऐसी वैकल्पिक तिथियों पर आयोजित रथयात्राएं शास्त्रीय परंपराओं के अनुरूप नहीं हैं। वहीं इस्कॉन का तर्क है कि शास्त्र केवल तिथि ही नहीं, बल्कि रथयात्रा का स्थान भी निर्धारित करते हैं। यदि स्थान की शर्त को भी उतनी ही सख्ती से लागू किया जाए, तो पुरी के बाहर रथयात्रा आयोजित ही नहीं की जा सकती। ऐसे में वैश्विक स्तर पर रथयात्रा के आयोजन के लिए योग्य आचार्यों द्वारा परंपराओं के अनुकूलन की आवश्यकता होती है।

विवाद का एक अन्य पहलू विदेशी भक्तों की भागीदारी को लेकर भी है। जहां पुरी मंदिर में विदेशी श्रद्धालुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध है, वहीं इस्कॉन अपने विदेशी अनुयायियों को धार्मिक संस्कार देकर जगन्नाथ पूजा और सेवा में शामिल करता है। इस विषय पर भी दोनों पक्षों के विचार अलग-अलग हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि असली बहस रथयात्रा की तिथियों से कहीं आगे बढ़ चुकी है। सवाल यह है कि जगन्नाथ संस्कृति का वैश्विक स्वरूप किस दिशा में जाएगा और इसके प्रसार में परंपरागत पुरी व्यवस्था की भूमिका अधिक प्रभावी होगी या दुनिया भर में फैला इस्कॉन आंदोलन।

फिलहाल यह विवाद धार्मिक, सांस्कृतिक और वैचारिक विमर्श का विषय बना हुआ है, जिस पर देश और विदेश के श्रद्धालुओं तथा विद्वानों की नजर बनी हुई है। देखे राजेश शिवहरे की रिपोट 

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