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बनारस क्लब की मुश्किलें बढ़ीं: कूटकरण और फर्जी दस्तावेज मामले में कोर्ट पहुंची 'अवैध कब्जे' की जंग
  • 151009219 - RAVINDRA GUPTA 0 0
    20 May 2026 20:28 PM



वाराणसी । बनारस के ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित 'द बनारस क्लब लिमिटेड' की कानूनी मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। कलेक्ट्रेट के राजस्व बार एसोसिएशन से जुड़े वरिष्ठ अधिवक्ता प्रार्थी जितेन्द्र कुमार तिवारी ने वाराणसी के विशेष न्यायाधीश (SC/ST Act) की अदालत में एक प्रार्थना पत्र दाखिल कर बनारस क्लब के मौजूदा और पूर्व पदाधिकारियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। प्रार्थी ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 379 (जो पूर्व में CrPC की धारा 340 थी) के तहत मुकदमा दर्ज कर जांच कराने की मांग की है। मामले की अगली सुनवाई के लिए 23 मई 2026 की तिथि नियत की गई है। इस पूरे प्रकरण की जानकारी प्रार्थी/वरिष्ठ अधिवक्ता जितेंद्र तिवारी के द्वारा बुधवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए दिया गया।

शिकायतकर्ता के अनुसार, कैंट थाना क्षेत्र में स्थित बनारस क्लब लिमिटेड की स्थापना सन् 1848 में हुई थी और इसे कंपनी एक्ट 1882 के तहत एक 'बिना लाभ वाली संस्था' के रूप में पंजीकृत कराया गया था। क्लब के पास वर्ष 1925 में महज़ 10 वर्षों के लिए एक लीज निष्पादित की गई थी। विवाद तब गहराया जब नगर मजिस्ट्रेट, वाराणसी की जांच के बाद पाया गया कि क्लब ने ग्राम पहड़पुर और पुलिस कार्यालय के पास स्थित बाग की कीमती जमीनों (आराजी नंबर 211 व 850) पर कथित तौर पर अवैध रूप से कब्जा कर रखा है। इस पर संज्ञान लेते हुए 27 जनवरी 2011 को कोर्ट ने क्लब की बेदखली का आदेश पारित किया था। इस बेदखली के आदेश के खिलाफ क्लब द्वारा जिला जज न्यायालय में पब्लिक प्रीमिसेज एक्ट (PP Act) के तहत अपील दायर की गई थी, जो वर्तमान में विशेष न्यायाधीश की अदालत में विचाराधीन है।

दस्तावेजों में हेरफेर: वाराणसी निबंधन कार्यालय (रजिस्ट्री ऑफिस) के इंडेक्स और सरकारी अभिलेखों में कूटकरण (टैंपरिंग) कर फर्जी व कूटरचित दस्तावेज तैयार किए गए हैं।

मूल प्रतियों का गायब होना: कोर्ट में सिर्फ दस्तावेजों की छाया प्रतियां (फोटोकॉपी) लगाई गई हैं, जबकि असल (मूल) दस्तावेज गायब हैं।

ROC में झूठी जानकारी: एक तरफ कागजों में क्लब को 'नो प्रॉफिट' संस्था दिखाया गया है, वहीं दूसरी तरफ कानपुर स्थित रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज (ROC) के समक्ष लाखों रुपये सदस्यता शुल्क के रूप में लेना दर्शाया गया है, जो कि असलियत में इससे कई गुना ज्यादा है।

दस्तावेज के अनुसार, बीते 5 फरवरी 2026 को सरकारी वकील द्वारा भी कोर्ट में आपत्ति दाखिल की गई थी। इसमें स्पष्ट कहा गया था कि क्लब की ओर से न्यायालय के ऊपर नाजायज दबाव और भय का माहौल बनाने के उद्देश्य से भ्रामक तथ्य पेश किए जा रहे हैं, जो कि गहरी जांच का विषय है।

इस मामले में बनारस क्लब लिमिटेड के अलावा इसके डायरेक्टरों और पूर्व पदाधिकारियों को पक्षकार (विपक्षी) बनाया गया है। इनमें वर्तमान सचिव दी बनारस क्लब लिमिटेड व डायरेक्टर अतुल सेठ, दीपेश वशिष्ट, राकेश बजाज, गौरव दास, दीपक मधोक,अनिल ओहरी, तन्मय देवा, रोहित कपूर, धवल प्रकाश अग्रवाल, अमित कुमार अग्रवाल, वर्तमान व पूर्व सचिव (नवीन कुमार कपूर, डॉ प्रफुल्ल सोमानी सचिव 2011, जयदीप सिंह सचिव 2017, नरेन्द्र प्रताप सिंह सचिव 2024, उदय राजगढ़िया सचिव 2019-20) समेत वर्ष 2019-20 के पूर्व कमिश्नर/अध्यक्ष दीपक अग्रवाल और पूर्व जिलाधिकारी/उपाध्यक्ष दी बनारस क्लब सुरेन्द्र सिंह एवं उपनिबंधक सदर वाराणसी के नाम शामिल हैं।

प्रार्थी ने अदालत से गुहार लगाई है कि न्याय प्रणाली की शुचिता बनाए रखने के लिए इस पूरे आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी और कूटकरण की उच्च स्तरीय विधिक जांच कराई जाए। अब पूरे शहर की निगाहें 23 मई को होने वाली कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हुई हैं ।। रविन्द्र गुप्ता 



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