फास्ट न्यूज इंडिया यूपी प्रतापगढ़। प्रतापगढ़ रामानुज आश्रम ओमप्रकाश पांडे अनिरुद्ध रामानुजदास ने हिंदू धर्म और भारत माता के संबंध में कहा है कि हमारे सनातन धर्म के शास्त्रों में हिंदू नाम का कोई धर्म नहीं और भारत नाम की कोई माता नहीं है। श्रीमद्भागवत के अनुसार नव वर्ष हैं।नव वर्ष में एक भारतवर्ष है। भारती नामक सरस्वती देवी और जन्मभूमि, राष्ट्रभक्ति हेतु पृथ्वी देवी हैं। इनकी शास्त्रीय पूजा ही फलित होती है। इसीलिए प्रत्येक शुभ कार्य में शुभारंभ करने के पहले पृथ्वी पूजन होता है। भारत माता नामक काल्पनिक देवी इसीलिए लायी गयी ताकि वास्तविक देवता, मन्त्र और देवालय से दूर करके सनातन धर्मियों को भटकाया जा सकें।
संसार में जितने भी संप्रदाय और धर्म के लोग हैं उनके पूर्वज सभी सनातन धर्मी थे। ब्राह्मण ऋषियों मुनियों की संताने हैं। चंद्रमा के पुत्र बुध, बुध के पुत्र पुरूरवा हुए। पुरूरवा के पुत्र संसार में सभी दिशाओं में क्षत्रिय गण हुए।मनु का पृषध्र नामक पुत्र गुरु की गाय का वध करने के कारण शूद्र हो गया। मनु का पुत्र करूष था करुष से कारूष नामक महाबली तथा पराक्रमी क्षत्रिय गण उत्पन्न हुए। दिष्ट का पुत्र नाभाग वैश्य हो गया था। उससे बलंधन नामक पुत्र हुआ बलंधन से महान कीर्तिमान हुए। वर्ण व्यवस्था भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए स्वयं कहा है मेरे द्वारा बनाई गई है। वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था को मिटाया नहीं जा सकता। चाहे सनातन धर्मी हों चाहे मुसलमान हों चाहे ईसाई हों सभी में जाति व्यवस्था है। जाति व्यवस्था को तोड़कर वर्ण व्यवस्था को तोड़कर यदि आप रोटी बेटी का रिश्ता बनाएंगे तो वर्ण शंकर संताने पैदा होगीं जिससे धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने स्वयं अपने पूर्वज का नाम लेते हुए कहा कि रघुकुल रीति सदा चलि आई प्राण जाए पर वचन न जाई। अर्थात हमारी पहचान अपने कुल से है अपने पूर्वजों से है। हम गर्व से कह सकते हैं हम ब्राह्मण हैं, क्षत्रिय हैं, वैश्य हैं, हम कायस्थ हैं, चतुर्थ वर्ण की फला जाति से हैं। इसीलिए विवाह के पूर्व वर्ण जाति गोत्र और नाड़ी का मिलान होता है। महर्षि वेदव्यास जी ने इन सब बातों की भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी ―अदृष्ट्वा शास्त्रकथनं ब्रह्महत्यैव गीयते।देवानां भेदनिन्दे च देवतावध उच्यते॥ आत्महत्या हि सा प्रोक्ता जाबाले नात्र संशयःशास्त्रार्थमन्यथा यस्तु व्याख्यायति सुमन्दधी:।स चापि ब्रह्महत्यायाः पातकी परिगीयते॥ यः पुराणेषु चार्थेषु स्वयं श्लोकादि कल्पयेत्।स चापि ब्रह्महत्यायाः पातकी परिगीयते॥ कल्पयिष्यन्ति शास्त्राणि स्वबुध्या देवता अपि। त्यक्ष्यन्ति धर्मशास्त्राणि निन्दयिष्यन्ति तान्यपि॥ अन्तःशठा महाक्रूरा परद्रव्याभिलिप्सवः।भ्रमन्ते वैष्णवैर्वेशधारयिष्यन्त्यसज्जनान्॥ पुराणार्थविदां साधुशीलानाञ्च द्विजन्मनाम्। देवताद्वेषकास्ते वै द्वेषयिष्यन्ति सर्वदा॥ अन्यवर्णाश्रमश्चिह्नरन्येऽधिष्यन्ति लोभिन:। (बृहद्धर्मपुराणे)हे जाबाले ! जो व्यक्ति बिना शास्त्रों को ठीक से देखे ही उनके विषय में कथन दे देता है, उसके पाप को ब्रह्महत्या के समान समझना चाहिए। देवताओं में भेद देखने वाले एवं उनकी निन्दा करने वाले को देवतावध का पाप लगता है, जो आत्महत्या के ही समान है "इसमें संशय नहीं है"। जो शास्त्रों का मनमाना अर्थ लगाता है, और जो मूर्ख ऐसा ही व्याख्यान देता है, उसे भी ब्रह्महत्या के समान पातकी जानना चाहिए। जो पुराणों के अर्थों में अपनी कल्पना से ही श्लोकों को बताता है, (अथवा श्लोकों को ही काल्पनिक बताता है) उसे भी ब्रह्महत्या का ही दोषी बताया गया है। कलियुग में लोग अपने मन से शास्त्रों एवं देवताओं की कल्पना करके व्याख्या करेंगे। मान्य धर्मशास्त्रों को छोड़कर, उनकी निन्दा भी करेंगे। अन्दर से शठबुद्धि वाले, अत्यन्त क्रूर स्वभाव वाले, तथा दूसरे के धन के अपहरण की इच्छा रखने वाले लोग, केवल वैष्णव वेश धारण करके और अयोग्य लोगों को वैष्णव वेश धारण करा कर भ्रमण किया करेंगे। जो ब्राह्मण पुराणों के अर्थ को जानने वाले होंगे, अच्छा और शीलयुक्त आचरण करने वाले होंगे, उन लोगों से, तथा देवताओं से भी ये लोग द्वेष करेंगे। साथ ही, बिना शास्त्रोक्त अधिकार के ही अन्य वर्ण या आश्रम के चिह्न को (प्रतिष्ठा आदि के) लोभ से धारण कर लेंगे। (बृहद्धर्मे पुराणे)। हमें गर्व होना चाहिए कि हम ब्राह्मण हैं, हम क्षत्रिय हैं, हम वैश्य हैं, हम कायस्थ हैं और हम चतुर्थ वर्ण के हैं। रिपोर्ट विशाल रावत 151019049
