मथुरा। देश में जब पेट्रोल, डीजल या रसोई गैस के दाम बढ़ते हैं तो पूरे देश में राजनीतिक बहस शुरू हो जाती है। विपक्ष सरकार को घेरता है, संगठन सड़क पर उतर आते हैं और आम जनता में भी व्यापक चर्चा होती है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि जब जीवन बचाने वाली दवाइयों की कीमतें बढ़ाई जाती हैं, तब न तो जनता को इसकी जानकारी होती है और न ही कोई बड़ा राजनीतिक या सामाजिक आंदोलन दिखाई देता है।
दवा कंपनियां समय-समय पर आवश्यक मेडिसिन के दाम बढ़ाती रहती हैं। कई बार यह बढ़ोतरी इतनी अधिक होती है कि गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों पर सीधा आर्थिक बोझ पड़ता है। गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए यह बढ़ी हुई कीमतें किसी संकट से कम नहीं हैं। इसके बावजूद देश के अधिकांश राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और उपभोक्ता मंच इस मुद्दे पर मौन रहते हैं।
प्रश्न यह है कि आखिर दवाइयों की कीमतों पर जनता की आवाज इतनी कमजोर क्यों हो जाती है? क्या स्वास्थ्य और जीवन से जुड़ा मुद्दा पेट्रोल-डीजल से कम महत्वपूर्ण है? यदि गैस सिलेंडर के कुछ रुपये बढ़ने पर राष्ट्रीय बहस हो सकती है, तो जरूरी दवाइयों के दाम बढ़ने पर देशव्यापी चर्चा क्यों नहीं होती?
आज आवश्यकता है कि सरकार दवा कंपनियों पर सख्त निगरानी रखे, आवश्यक दवाइयों की कीमतों को नियंत्रित करे और जनता को पारदर्शी जानकारी उपलब्ध कराए। साथ ही सभी राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और उपभोक्ता अधिकार समूहों को इस गंभीर विषय पर आगे आकर आवाज उठानी चाहिए।
स्वास्थ्य कोई व्यापार नहीं, बल्कि जनता का मूल अधिकार है। यदि दवाइयां आम आदमी की पहुंच से बाहर होती चली गईं, तो यह समाज और व्यवस्था दोनों के लिए गंभीर खतरे का संकेत होगा।
रिपोर्ट नंद किशोर शर्मा 151170853
