पश्चिम एशिया में जारी युद्ध को लेकर वरिष्ठ समाजसेवी राजेश खुराना ने संयम, सहयोग, समझदारी, सतर्कता और राष्ट्रहित में सामूहिक जिम्मेदारी निभाने की अपील की है। वरिष्ठ समाजसेवी राजेश खुराना ने कहा कि ईरान-अमेरिका तनाव और खाड़ी देशों में जारी संघर्ष का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित होने से पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी की आशंका बनी हुई है। उन्होंने चेतावनी दी कि युद्ध भले ही कुछ समय के लिए थम जाए, लेकिन परिस्थितियां अभी भी अस्थिर हैं और भविष्य में लंबे संघर्ष की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। उनका कहना हैं कि यह केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जिम्मेदारी का समय है, जहां हर व्यक्ति का योगदान देश को मजबूत बना सकता है।
उन्होंने कहा, सबको पता हैं कि पेट्रोल, डीजल, सीएनजी के दामों में बढ़ोतरी वैश्विक संकट का परिणाम है। हालांकि अन्य देशों की तुलना में भारत में स्थिति बेहतर है। मध्य पूर्व में अमेरिका-ईरान का टकराव जारी है। इस संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल की कीमतों पर गहरा दबाव डाला है। पूरे विश्व में जो हालात चल रहे है किसी से छिपे नहीं है। इन्हीं कारणों के कारण महंगाई और ईंधन की कीमतों में इजाफा हो रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों के कारण भारत ने दुनिया के अन्य देशों की तुलना में महंगाई को फिर भी नियंत्रित कर रखा है और ईंधन की कीमतें भी उस हिसाब से नहीं बढ़ाई गई है। पूरी दुनिया में पेट्रोल-डीजल और गैस के दाम बहुत तैजी से कई गुना बढ़े हैं, लेकिन भारत में अभी भी कीमतें कम हैं।
कोरोना महामारी वैश्विक संकट थी, तो ईरान युद्ध इस दशक का सबसे बड़ा संकट है।
खाड़ी युद्ध से उपजे हालात व बाधित वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के बीच ईंधन के उपयोग में संयम बरतने की अपील निस्संदेह, वक्त की जरूरत है। विशेषज्ञ माना है कि कोरोना महामारी वैश्विक संकट थी, तो ईरान युद्ध इस दशक का सबसे बड़ा संकट है। दरअसल युद्ध और होर्मुज जलमार्ग बंद होने के कारण ऊर्जा-संकट दुनिया भर में है। कच्चा तेल महंगा मिलने के कारण भारत को हर रोज 1619 करोड़ रुपए अतिरिक्त खर्च करने पड़ रहे हैं। आयात बिल में खाद्य तेल पर 1.86 लाख करोड़ और खाद पर 1.38 लाख करोड़ रुपए खर्च करने पड़ते हैं। बाजार में यूरिया, डीएपी की कीमतें दोगुनी बढ़ा दी गई हैं। इसके अलावा, सरकार को खाद पर करीब 2 लाख करोड़ रुपए की सब्सिडी किसानों को देनी पड़ रही है। नतीजतन बुनियादी ढांचे और विकास पर किया जाने वाला पूंजीगत खर्च कम करना पड़ रहा है।
इस संकट के कारण चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है। तमाम आयातों पर विदेशी मुद्रा खर्च होती है। यह अकाल हम 1990-92 के दौर में झेल चुके हैं, जब देश का 67 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था। प्रधानमंत्री मोदी ने आर्थिक संकट और पेट्रो उत्पादों की कमी के कारण देश से अपील नहीं की है। वह न ही किसी तरह के दान के पक्ष में हैं, जैसा कि जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री कालों के दौरान किया गया था। प्रधानमंत्री आयात कम करने के पक्षधर हैं, ताकि विदेशी मुद्रा को बचाया जा सके।
ईरान युद्ध की शुरूआत में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 720 अरब डॉलर का था, लेकिन युद्ध के करीब 75 दिन के बाद यह भंडार घट कर 690 अरब डॉलर हो गया है, लिहाजा प्रधानमंत्री ने उन खर्चों को कम करने की अपील की है, जिनमें डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। करीब 80 फीसदी कच्चे तेल और 70 फीसदी से अधिक सोने के आयात डॉलर में ही किए जाते हैं।
प्रधानमंत्री ने एक साल तक संयम बरतने की अपील की है, भारत सरकार ने विदेशों से 168 टन सोना खरीदा है। अब भारत के पास सोने का कुल भंडार 880 टन का है। वैश्विक संकट के कारण निस्संदेह, हालात काफी दिनों से चुनौतीपूर्ण बने हैं, रुपये में तेज गिरावट व महंगे कच्चे तेल के आयात की वजह से हमारा विदेशी मुद्रा भंडार काफी दबाव में है।
वहीं, आज़ इस संकट से पूरी दुनियां जूझ रही हैं। यह संकट असुरक्षा बोध पैदा करता है, जिसका दुनियां पर नकारात्मक असर भी पड़ सकता है। दरअसल, इससे कृत्रिम संकट पैदा करने वाले तत्व भी सक्रिय हो जाते हैं। इससे चीजों की जमाखोरी और कालाबाजारी को भी बढ़ावा मिलता है। इसमें दो राय नहीं कि देश बड़ी मात्रा में कच्चा तेल व सोना आयात करता है। जाहिर बात है जब इनकी वैश्विक कीमतें बढ़ती हैं तो इन दोनों के कारण भारी दबाव देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है। निस्संदेह, विषम वैश्विक परिस्थितियों में ईंधन की बचत,स्वदेशी और घरेलू पर्यटन को बढ़ावा देना और आयात पर निर्भरता कम करना चुनौतियों से मुकाबले के लिये समझदारी भरे उपाय हैं।
उनका कहना है कि जिस प्रकार कोरोना महामारी के कठिन दौर में पूरे देश ने एकजुट होकर संकट का सामना किया था, उसी तरह आज देशहित में, पश्चिम एशिया में उत्पन्न हालातों के बीच भी राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए जिम्मेदार नागरिक की भूमिका निभानी होगी। उन्होंने बताया कि बढ़ती तेल कीमतों का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था, परिवहन व्यवस्था और आम जनजीवन पर पड़ सकता है। इसी को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने हाल ही में देशवासियों से सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग करने और आवश्यकता पड़ने पर घर से कार्य करने की अपील की थी, ताकि ईंधन की खपत कम हो और देश वैश्विक संकट के बीच भी मजबूती के साथ आगे बढ़ सके।
श्री खुराना ने आगे कहा कि युद्ध के कारण कई देशों में ऊर्जा और खाद्य संकट गहराने लगा है। ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में पेट्रोल पंपों पर असर देखने को मिला है। पूरी दुनियां देशों पर सप्लाई चेन रुकने से बुरा असर पड़ रहा हैं। ऐसे हालातों में पेट्रोलियम और केमिकल उत्पादों के संयमित उपयोग की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार ने पेट्रोल या डीजल के उपयोग को बंद करने की बात नहीं कही है, बल्कि विवेकपूर्ण और जरूरत के अनुसार उपयोग करने की सलाह दी है। उन्होंने अपील की कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सरकार की अपीलों और परिस्थितियों को गंभीरता से समझें। ताकि भविष्य में देश किसी बड़े ऊर्जा संकट से सुरक्षित रह सके। रिपोर्ट नंदकिशोर शर्मा 151170853
