हिंदू धर्म ग्रंथों में भगवान विष्णु के जन्म को लेकर मुख्य रूप से दो प्रकार के दृष्टिकोण बताए गए हैं—एक पौराणिक उत्पत्ति और दूसरा उनके अवतार रूप में जन्म की कथा।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, शिव पुराण में भगवान विष्णु को स्वयंभू नहीं माना गया है, बल्कि भगवान सदाशिव और आदिशक्ति द्वारा प्रकट बताया गया है। कहा जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में सदाशिव ने अपने वाम अंग से एक दिव्य पुरुष को प्रकट किया, जो चार भुजाओं वाले, कमलनयन और अत्यंत तेजस्वी थे। यही आगे चलकर भगवान विष्णु कहलाए, जिन्हें सृष्टि के पालन का दायित्व सौंपा गया।
इसके बाद भगवान विष्णु ने जल में तपस्या की, जिससे सृष्टि के संचालन और जीवन के विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ।
वहीं, दूसरी मान्यता के अनुसार जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है, तब-तब भगवान विष्णु अवतार लेते हैं। उनका सबसे प्रसिद्ध अवतार श्रीकृष्ण के रूप में माना जाता है।
द्वापर युग में, भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मथुरा के कारागार में माता देवकी और वासुदेव के यहां भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। कंस के अत्याचारों से पृथ्वी को मुक्त कराने के लिए यह अवतार लिया गया था।
जन्म के बाद वासुदेव जी नवजात कृष्ण को गोकुल ले गए, जहां नंद बाबा और यशोदा मैया ने उनका पालन-पोषण किया।
इस प्रकार, भगवान विष्णु की उत्पत्ति और उनके अवतारों की कथाएं हिंदू धर्म में आस्था, दर्शन और संस्कृति का महत्वपूर्ण आधार मानी जाती हैं। देखे भिंड से विमलेश की रिपोट
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