पीलीभीत। हरियाणा के सोनीपत से जब एंबुलेंस गांव की गलियों में दाखिल हुई, तो पूरा गोरा गांव चीखों और सिसकियों से गूंज उठा। जिस लईक को हंसी-खुशी अपनों ने परदेस विदा किया था, आज उसका बेजान शरीर देख हर किसी का कलेजा फट गया।
जैसे ही लईक का पार्थिव शरी।र घर के आंगन में रखा गया, कोहराम मच गया। पत्नी की बेसुध हालत जमीन पर गिर पड़ी और करुण क्रंदन ने पत्थर दिल इंसान को भी रुला दिया। सबसे ज्यादा दर्दनाक मंजर वह था, जब लईक के दो छोटे बच्चे अपने पिता के निर्जीव शरीर को अपलक निहार रहे थे—शायद वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि अब उनका कंधा देने वाला हाथ हमेशा के लिए उठ चुका है।
अंतिम संस्कार की तैयारियां शुरू हुईं, तो पूरे गांव की भीड़ उमड़ पड़ी। हर कोई उस मेहनतकश मजदूर को आखिरी विदाई देने के लिए बेताब था, जिसने परिवार की खातिर हरियाणा में जाकर पसीना बहाया।भारी मन और गीली आंखों के साथ ग्रामीणों ने लईक के जनाजे को कंधा दिया।
स्थानीय कब्रिस्तान में धार्मिक रीति-रिवाजों के बीच लईक को सुपुर्द-ए-खाक किया गया। जैसे-जैसे कब्र पर मिट्टी पड़ रही थी, वैसे-वैसे एक गरीब परिवार के सारे सपने और उम्मीदें भी जमींदोज हो रही थीं।
लईक तो शांत हो गया, लेकिन पीछे छोड़ गया है एक उजाड़ घर और अनगिनत सवाल। लईक के दो छोटे बच्चे, जो कल तक पिता के लौटने की राह तक रहे थे, अब घर में मचे कोहराम को फटी आंखों से देख रहे हैं। उन्हें नहीं पता कि अब उनकी पढ़ाई और परवरिश की जिम्मेदारी कौन उठाएगा। पिता का साया छिनने के बाद उन मासूमों की खामोशी सरकार और समाज के सुरक्षा दावों पर गहरे सवाल खड़े कर रही है।
परदेस की मिट्टी में मजदूरी करते-करते जान गंवाने वाले लईक की कहानी आज हर उस मजदूर की कहानी है, जिसकी जिंदगी की कीमत सिर्फ चंद रुपयों की दिहाड़ी बनकर रह गई है। गोरा गांव ने आज सिर्फ एक ग्रामीण नहीं, बल्कि अपनी मेहनत के दम पर भविष्य बदलने का जज्बा रखने वाला एक नौजवान खो दिया है। क्या एक गरीब की जान की कीमत सिर्फ एक अखबार की सुर्खी बनकर रह जाएगी? सोनीपत में दम तोड़ने वाले लईक सिर्फ एक मजदूर नहीं, बल्कि उन हजारों उम्मीदों का प्रतीक था जो गरीबी के कारण परदेस में दम तोड़ देती हैं। देखना यह है कि प्रशासन इस 'पहाड़ जैसे दुख' को कम करने के लिए हाथ आगे बढ़ाता है या यह परिवार अंधेरे में ही खो जाएगा। रिपोर्ट जियाउल हक खान -151173981
