भारतीय संविधान के शिल्पकार, सामाजिक न्याय के प्रणेता और विश्व स्तर पर सम्मानित महान विचारक डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी की 135वीं जयंती को ‘विश्व ज्ञान दिवस’ के रूप में मनाने की अपील के साथ समाज में उनके विचारों को व्यापक रूप से अपनाने की मांग उठी है।
वरिष्ठ समाजसेवी राजेश खुराना ने इस अवसर पर कहा कि बाबा साहेब को आज तक जितना सम्मान मिला है, वे उससे कहीं अधिक के हकदार हैं। उन्होंने कहा कि अम्बेडकर जी का योगदान केवल भारत तक सीमित नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने बताया कि आज बाबासाहेब की जयंती केवल भारत में ही नहीं, बल्कि न्यूयॉर्क, टोरंटो, लंदन, टोक्यो, हंगरी और दुबई सहित विश्व के अनेक अंतरराष्ट्रीय शहरों में भी श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई जाती है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 14 अप्रैल को ‘विश्व ज्ञान दिवस’ के रूप में मान्यता दिया जाना उनके बढ़ते वैश्विक प्रभाव का प्रमाण है।
राजेश खुराना ने कहा कि अम्बेडकर जी केवल एक संविधान निर्माता नहीं, बल्कि ज्ञान, संघर्ष और असाधारण विद्वता के प्रतीक थे। उनकी शिक्षा के प्रति लगन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अल्प समय में उच्च शिक्षा के कई कीर्तिमान स्थापित किए और हजारों पुस्तकों का अध्ययन किया। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि विश्व के कई प्रतिष्ठित विद्वानों और नेताओं ने अम्बेडकर जी के ज्ञान और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण की सराहना की है।
उन्होंने कहा कि विश्वप्रसिद्ध लेखक जॉन गुंथर ने अपनी पुस्तक इनसाइड एशिया में लिखा डॉ. अम्बेडकर जी के विचारों से राष्ट्रवाद और देशभक्ति छलकती है।अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उन्हें “ज्ञान का प्रतीक” कहते हुए कहा था कि “यदि अम्बेडकर जी हमारे देश में जन्म लेते तो हम उन्हें सूर्य कहते। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने भी अम्बेडकर जी को अपना गुरु मानते हुए कहा था कि उनके योगदान का सम्मान अभी भी अधूरा है। प्रसिद्ध नेता पं. मदनमोहन मालवीय ने 1935 में कहा था अम्बेडकर जी के राष्ट्रवादी पांडित्य का मुकाबला संपूर्ण भारत के बुद्धिजीवी मिलकर भी नहीं कर सकते।
उन्होंने बताया कि अम्बेडकर जी ज्ञान, संघर्ष और असाधारण विद्वता का अनुपम संगम हैं। बाबासाहेब दुनिया के सबसे अधिक शिक्षित महान व्यक्तित्वों में गिने जाते हैं। वे अक्सर मजाक में कहते थे कि “मेरे पास डिग्रियों के ट्रंक भरे पड़े हैं, यदि उनसे कुछ हासिल कर सकते हो तो कर लो। उनकी ज्ञान-पिपासा का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में 1000 दिनों में 16,000 पुस्तकें पढ़ीं। 8 वर्षों की पढ़ाई सिर्फ 2 वर्ष 3 महीने में पूर्ण कर दी। वे 14 भाषाओं के ज्ञाता थे। कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान 2000 पुस्तकें खरीदीं। गोलमेज सम्मेलन के समय खरीदी गई पुस्तकें 32 संदूकों में भारत पहुंचीं। मुंबई स्थित उनके निवास ‘राजगृह’ का पुस्तकालय दुनिया के सबसे बड़े निजी पुस्तकालयों में गिना जाता है, जहां लाखों दुर्लभ पुस्तकों का संग्रह था।
उन्होंने यह भी बताया कि विश्व ज्ञान रत्न वैश्विक मान्यताओं से प्रतिष्ठित व्यक्तित्व हैं। 1953 में उस्मानिया विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट. और 1952 में कोलंबिया विश्वविद्यालय ने मानद एलएल.डी. की उपाधि दी। प्रशस्ति में लिखा गया यह सम्मान भारतीय संविधान निर्माण में उनकी अद्वितीय भूमिका के लिए है। वे महान समाज सुधारक और मानवाधिकारों के रक्षक हैं। महाराष्ट्र सरकार द्वारा उनके स्कूल प्रवेश दिवस 7 नवंबर को ‘विद्यार्थी दिवस’ घोषित करना भी उनकी शिक्षा-प्रेरणा का सम्मान है। उनका योगदान अमूल्य है, और वे जितने सम्मान के अधिकारी हैं, दुनिया अभी भी उससे कम दे पा रही है। आज़ तक डॉ. अम्बेडकर जी को जितना सम्मान मिला है, वे उससे कहीं अधिक के हक़दार हैं। उनके विचारों ने भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना की नींव रखी, और इसके माध्यम से भारतीय मुद्रा प्रणाली को संगठित और सशक्त बनाने का मार्ग प्रशस्त किया" डॉ. आंबेडकर जी के योगदान को याद करते हुए वरिष्ठ समाजसेवी राजेश खुराना ने कहा, "भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले विद्वान अर्थशास्त्री और मानवाधिकारों के जनक, भारतरत्न डॉ. बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर जी को उनके योगदान के लिए विनम्र अभिवादन। डॉ. बाबा साहब ने भारतीय आर्थिक संरचना को सशक्त बनाने के लिए जो मार्गदर्शन दिया, वह देश के आर्थिक केन्द्रीकरण, स्वतंत्रता और प्रगति की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ।
श्री खुराना ने यह भी बताया कि डॉ. आंबेडकर जी के सुझावों और उनकी प्रसिद्ध पुस्तक भारतीय रुपये की समस्या - इसकी उत्पत्ति और समाधान के आधार पर 1926 में हिल्टन यंग कमीशन (रॉयल कमीशन ऑन इंडियन करेंसी एंड फायनेंस) द्वारा भारतीय रिज़र्व बैंक की अवधारणा तय की गई थी। उनके विचारों ने भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना की नींव रखी, और इसके माध्यम से भारतीय मुद्रा प्रणाली को संगठित और सशक्त बनाने का मार्ग प्रशस्त किया गया। उन्होंने कहा,1 अप्रैल 1935 को भारतीय रिज़र्व बैंक की औपचारिक स्थापना की गई, लेकिन अफसोस की बात यह है कि डॉ.बाबा साहब को भेदभाव के कारण वह सम्मान और मान्यता नहीं दी, जिसके वे पूरी तरह से पात्र थे। उनके योगदान को न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में बल्कि भारतीय समाज की सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता में भी अनदेखा किया गया।
राष्ट्रवादी विचारों से क्यों डर? पुस्तकों से जागती है देशभक्ति
राजेश खुराना ने अपने संबोधन में राष्ट्रवादी विचारधारा और ऐतिहासिक साहित्य के महत्व पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अम्बेडकर जी की ‘पाकिस्तान और द पार्टिशन ऑफ इंडिया’ तथा ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ जैसी पुस्तकों को गंभीरता से पढ़ता है, उसके भीतर स्वतः ही राष्ट्र के प्रति समर्पण और देशभक्ति की भावना विकसित होती है। उन्होंने कहा कि इन पुस्तकों में न केवल भारत के विभाजन के ऐतिहासिक तथ्यों का विश्लेषण है, बल्कि उस दौर की सामाजिक और राजनीतिक सच्चाइयों का भी स्पष्ट चित्रण मिलता है। कुछ तत्वों द्वारा इन सच्चाइयों को दबाने के प्रयासों का भी उन्होंने उल्लेख किया।
उन्होंने बताया कि उनके द्वारा लिखी गई ये पुस्तकें न केवल इतिहास के महत्वपूर्ण पहलुओं को उजागर करती हैं, बल्कि बंगाल, हैदराबाद और विभाजन के दौर में हुए दंगों की सच्चाई से भी आम लोगों को परिचित कराती हैं। उन्होंने बताया कि इन सच्चाइयों से असहज होने वाले कुछ तत्वों पूरे 100 साल तक समय-समय पर उनके राष्ट्रवादी विचारों को दबाने और मिटाने का प्रयास किया और पूर्व की सरकारों ने 70 साल तक अम्बेडकर जी को सम्मान नहीं दिया गया। इतिहास में कई बार ऐसा हुआ कि कड़बी सच्चाई सामने न आए, इसलिए कई पुस्तकों को नष्ट तक किया गया।
उन्होंने यह भी कहा कि पूर्व की सरकारों के कुछ नेता उनके राष्ट्रवादी विचारों और इन गंभीर विषयों पर खुलकर बोलने से बचते रहे, जिससे भ्रम और असमंजस की स्थिति बनी रही। यही कारण है कि आज भी कुछ समूह राष्ट्रवादी प्रतीकों, मूर्तियों चिन्होँ और विचारों को नुकसान पहुंचाने का प्रयास करते हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे बाबा साहब के द्वारा लिखी राष्ट्रवादी किताबों को स्वयं पढ़ें एवं समझें और बच्चों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित करें, ताकि ज्ञान और जागरूकता का प्रसार घर- घर में हो सके और ये महत्वपूर्ण सन्देश देश-विदेश और प्रदेश भर में बड़े स्तर जाये। उनके चिंतन और राष्ट्रवादी विचारों में देश सबसे ऊपर हैं, उनके राष्ट्रीवादी विचारों को अपनाकर ही देश को प्रगति और विकास के पथ पर आगे बढ़ाया जा सकता है।
युवाओं के लिए संदेश: पढ़ें, समझें और जागरूक बनें
राजेश खुराना ने युवाओं और समाज के हर वर्ग से अपील करते हुए कहा कि वे अम्बेडकर जी के विचारों को स्वयं पढ़ें और अपने बच्चों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित करें। उन्होंने कहा कि बाबा साहेब का जीवन केवल एक प्रेरणा नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शन है, जिसमें राष्ट्र सर्वोपरि है। उनके विचारों को अपनाकर ही देश को प्रगति और विकास के मार्ग पर आगे बढ़ाया जा सकता है। अंत में उन्होंने कहा कि अम्बेडकर जी की जयंती केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को जीवन में उतारने का संकल्प लेने का दिन है। "आज, उनकी 135वीं जयंती के अवसर पर हम डॉ.अम्बेडकर जी के योगदान को याद करते हुए उनके राष्ट्रवादी दृष्टिकोण को सम्मानित करते हैं, जो आज भी हमारे राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए प्रेरणा स्रोत है। उनका जीवन राष्ट्रवादी विचारों, समाज सुधार, मानवाधिकार और न्याय, समानता की लड़ाई का अद्वितीय उदाहरण है।
रिपोर्ट नन्द किशोर शर्मा 151170853

