एम्स गोरखपुर में जेंडर डिस्फोरिया का एक मामला सामने आया है। अपने ही शरीर में परायापन महसूस करना, जैसे जीवन नहीं बल्कि कैद मिली हो ऐसी ही जटिल मानसिक स्थिति से जूझ रहे एक 20 वर्षीय युवक का मामला एम्स गोरखपुर के मनोचिकित्सा विभाग में सामने आया है। युवक शारीरिक रूप से पुरुष है, लेकिन उसकी आंतरिक पहचान एक स्त्री के रूप में विकसित हो रही है। जो खुद को महिला मानता है और उसी रूप में जीना चाहता है। परिजन इसे मानसिक समस्या समझकर इलाज के लिए अस्पताल लेकर पहुंचे थे, लेकिन एम्स के मनोचिकित्सकों ने युवक को उपचार की बजाय उसके अधिकारों के बारे में समझाया।
काउंसिलिंग में सामने आई सच्चाई
काउंसिलिंग के दौरान चिकित्सकों को पता चला कि गोरखपुर का यह युवक शारीरिक रूप से पुरुष है, लेकिन मानसिक रूप से खुद को महिला मानता है। वह बार-बार खुद को लड़की के रूप में ही प्रस्तुत करना चाहता है। परिजनों को पहले तो यह स्वीकार करने में कठिनाई हुई। उन्होंने बताया कि बचपन में युवक सामान्य था, लेकिन किशोरावस्था पार करने के बाद।उसे लड़कियों की तरह रहना, पहनावा और व्यवहार अपनाना अच्छा लगने लगा। जब उसने लड़की के रूप में रहने की इच्छा जाहिर की तो परिवार घबरा गया और इसे बीमारी समझकर इलाज के लिए अस्पताल ले आया। डॉक्टरों ने परिजनों को समझाया कि बेटे को खोने या सामाजिक प्रतिष्ठा पर आंच आने की आशंका निराधार है। उन्होंने युवक को घुट-घुट कर जीने की बजाय आत्मविश्वास और सम्मान के साथ जीने का रास्ता सुझाया।
ऐसे ही एक मामले में रेलवे के इज्जतनगर कारखाने में कार्यरत एक कर्मचारी ने लिंग परिवर्तन के बाद महिला के रूप में पहचान प्राप्त की, जिसे विभाग ने भी मान्यता दी।
बीमारी नहीं, पहचान का सवाल
एम्स गोरखपुर के मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. राशिद आलम ने बताया कि यह मानसिक विकार नहीं है, बल्कि पहचान का मुद्दा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जैविक लिंग (जन्म के समय निर्धारित) और व्यक्ति की आंतरिक लैंगिक पहचान के बीच बेमेल होने के कारण पीड़ा या बेचैनी होती है, जिसे जेंडर डिस्फोरिया कहते हैं। इसका कोई उपचार नहीं होता है। यह कोई मानसिक रोग नहीं है, सही मार्गदर्शन न मिलने पर अवसाद और चिंता बढ़ सकती हैं
हार्मोन थेरेपी और सर्जरी विकल्प
एम्स गोरखपुर के इंडोक्राइनोलाजी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर, डा. देबादित्य दास ने बताया कि जेंडर डिस्फोरिया को पहले मानसिक रोग समझा जाता था लेकिन यह पूरी तरह इंडोक्राइनोलाजिस्ट का मामला होता है। काउंसिलिंग और मानसिक परीक्षण के बाद जब पुष्टि हो जाती है कि जेंडर डिस्फोरिया है तो युवक या युवती को उनके पसंद के लिंग को चुनने के लिए हार्मोन थेरेपी की जाती है। एक थेरेपी एक से दो साल चलती है। इसके बाद व्यक्ति चाहे तो लिंग परिवर्तन सर्जरी (SRS) भी करा सकता है।
कानून भी देता है अधिकार
गोरखपुर के वरिष्ठ अधिवक्ता अजय सिंह ने बताया कि जो लोग अपने लिंग के विपरीत व्यवहार करते हैं और उसी तरफ जाना चाहते हैं तो ऐसे लोगों को ट्रांसजेंडर की श्रेणी में रखा जाता है। देश में लागू ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 (जो 10 जनवरी 2020 से प्रभावी हुआ) है। के तहत ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को पहचान पत्र के लिए आवेदन करना चाहिए। यह अधिनियम लिंग पुनर्निर्धारण सर्जरी (एसआरएस) का भी अधिकार देता है। साथ ही शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं में समान अधिकार प्राप्त हैं। रिपोट - फूलमती मौर्य 151188511
