लोकतंत्र का गला घोंटते भ्रष्ट नुमाइंदे: पत्रकार बेटा लाचार, माँ तैयार है मौत को गले लगाने के लिए!"
उत्तर प्रदेश लखीमपुर खीरी जिले तहसील पलिया से बड़ी खबर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया का एक सिपाही आज खुद को 'बेचारा' महसूस कर रहा है। वजह है—बीस सालों से सिस्टम की फाइलों में दफन उसकी मां की चीख। उत्तर प्रदेश के पलिया क्षेत्र की ग्राम पंचायत नगला से एक ऐसी खबर सामने आई है, जो सूबे के सुशासन के दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी है। यहाँ संजीदा नाम की एक महिला अपनी ही पुश्तैनी जमीन के लिए पिछले दो दशकों से तहसील के गलियारों में एड़ियां रगड़ रही है, लेकिन खाकी और खादी के गठजोड़ ने न्याय का गला घोंट रखा है।
हैरानी की बात यह है कि जो मामला चंद घंटों की पैमाइश और पुलिस बल के हस्तक्षेप से सुलझ सकता था, उसे लेखपाल और कानूनगो ने 20 साल से 'लॉलीपॉप' थमाकर लटका रखा है। संजीदा का आरोप है कि गांव के कुछ दबंग, ग्राम प्रधान की शह पर उनकी जमीन पर कुंडली मारकर बैठे हैं। जब भी न्याय की मांग की जाती है, तो बदले में मिलती है—जान से मारने की धमकी
पीड़ित महिला और उसके पत्रकार बेटे ने न्याय के लिए हर दरवाजा खटखटाया।
5 महीने पहले जब मां-बेटा भूख हड़ताल पर बैठे, तो अधिकारियों ने 'बाढ़' का बहाना बनाकर टाल दिया।
8 दिन पहले लेखपाल और कानूनगो ने 24 घंटे में कब्जा दिलाने का 'पक्का' वादा किया, जो कि पूरी तरह सफेद झूठ निकला।
शनिवार को टीम मौके पर पहुंची, जमीन नापी, लेकिन कब्जा दिलाने के बजाय यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि “कब्जा खुद कर लो।"जब दबंग गांव में घुसने पर जान से मारने की धमकी दे रहे हैं, तो बिना प्रशासनिक सुरक्षा के एक बेबस महिला कब्जा कैसे ले? क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है?
भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा न्याय बिना रिश्वत, काम नहीं'
महिला ने सीधा और गंभीर आरोप लगाया है कि तहसील में बिना रिश्वत के कागज नहीं हिलते। भ्रष्टाचार ने तंत्र को इस कदर जकड़ लिया है कि दबंगों के रसूख के आगे गरीब की फरियाद कूड़ेदान में डाल दी जाती है। हताश होकर संजीदा ने अब अंतिम चेतावनी दी है अगर हमें न्याय नहीं मिला, तो मैं अपने पूरे परिवार के साथ आत्महत्या कर लूंगी, जिसकी जिम्मेदारी सीधे तौर पर स्थानीय प्रशासन, लेखपाल और कानूनगो की होगी। क्या उत्तर प्रदेश में 'जीरो टॉलरेंस' की नीति सिर्फ कागजों तक सीमित है 20 साल का समय क्या एक महिला के सब्र का इम्तिहान लेने के लिए काफी नहीं है जब दूसरों को न्याय दिलाने वाला पत्रकार खुद असुरक्षित है, तो आम जनता का क्या होगा यह मामला केवल एक जमीन का विवाद नहीं है, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता का चरम है। अगर समय रहते प्रशासन ने सुध नहीं ली, तो संजीदा की यह 'न्याय की पुकार' कहीं 'चीख' में न बदल जाए। अब देखना यह है लखीमपुर खीरी का जिला प्रशासन इस पर क्या एक्शन लेता है या फिर फाइलों पर धूल जमने का सिलसिला यूँ ही जारी रहेगा। रिपोट - जियाउल हक खान 151173981
