फास्ट न्यूज इंडिया यूपी प्रतापगढ़। रामानुज आश्रम, प्रतापगढ़ में धर्माचार्य ओमप्रकाश पांडे और अनिरुद्ध रामानुज दास ने जीवन में आने वाले उतार-चढ़ावों और विपरीत परिस्थितियों में निडर रहने की सीख देते हुए बताया कि माता से बड़ा कोई सहारा नहीं होता। उन्होंने महाभारत और श्रीमद्भगवत गीता के प्रमुख श्लोकों के माध्यम से सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। धर्माचार्यों ने कहा कि जीवन में सुख-दुःख आते रहते हैं, लेकिन उनसे डरना नहीं चाहिए। उन्होंने महाभारत के मंगलाचरण श्लोक को पढ़ने का महत्व बताया: “नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्।।” अर्थ: नारायण, अर्जुन, देवी सरस्वती और व्यास मुनि को नमस्कार कर महाभारत का पाठ करना चाहिए। भगवद्गीता के कर्म सिद्धांत पर उन्होंने जोर देते हुए कहा: “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।। अर्थ: हमें केवल कर्म करने का अधिकार है, उसके फलों में नहीं। कर्मफल की इच्छा में नहीं उलझना चाहिए और न ही अकर्मण्यता में लिप्त होना चाहिए। धर्माचार्यों ने धर्म की पुनर्स्थापना पर भी प्रकाश डाला: यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। अर्थ: जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं प्रकट होकर धर्म की रक्षा करता हूँ। उन्होंने सफलता और जीवन के सत्य के लिए महाभारत व भगवद्गीता के श्लोकों का उदाहरण देते हुए बताया कि माता, पिता और मन की महत्ता अत्यधिक है: “माता गुरुतरा भूमेः खात् पितोच्चतरस्तथा। मनः शीघ्रतरं वातात् चिन्ता बहुतरी तृणात्।।” अर्थ: माँ धरती से भी भारी है, पिता आकाश से ऊँचे हैं, और मन हवा से भी तेज है। धर्माचार्यों ने अंत में आत्म-नियंत्रण और मानसिक शांति के महत्व पर जोर देते हुए कहा: “दान से बढ़कर कोई कठिन धर्म नहीं है, माता से बड़ा कोई सहारा नहीं है, और मन की शांति से बढ़कर कोई सुख नहीं है।” इस अवसर पर आश्रम में उपस्थित लोगों ने धर्माचार्यों के उपदेशों को जीवन का मार्गदर्शन बताया और सभी ने प्रतिज्ञा की कि वे विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य और निडरता के साथ जीवन यापन करेंगे। धर्माचार्यों का यह संदेश जीवन में माता और धर्म के महत्व को पुनः स्मरण कराता है और मानसिक शांति तथा कर्मयोग की सीख देता है। रिपोर्ट विशाल रावत 151019049
