काशी के प्रख्यात संत देवेन्द्र जी महाराज ने नवरात्रि विशेष पर चतुर्थी तिथि पर उपदेश के क्रम में बताया भारत की सनातन संस्कृति में चैत्र नवरात्रि आस्था, शक्ति और साधना का अनुपम महापर्व है। यह केवल नौ दिनों का उत्सव नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण, मन के शुद्धिकरण और जीवन में नई ऊर्जा के संचार का पावन अवसर है। इन दिनों में भक्त अपनी श्रद्धा को दीप की लौ की तरह प्रज्वलित कर देवी शक्ति के चरणों में समर्पित करते हैं और संकल्प लेते हैं कि वे अज्ञान के अंधकार से निकलकर ज्ञान और सकारात्मकता के प्रकाश की ओर अग्रसर होंगे। यही वह कालखंड है, जब भक्ति भाव अपने उत्कर्ष पर होता है और जन-जन के हृदय में “जय माता दी” की गूंज नई आशा, नई शक्ति और नवआरंभ का संदेश बनकर फैलती है। वास्तव में, भारत की सनातन परंपरा में चैत्र नवरात्रि केवल तिथियों का क्रम नहीं, बल्कि जीवन के नवोदय, आत्मशुद्धि और शक्ति-आराधना का दिव्य संगम है, जो मनुष्य को बाहरी जगत से उठाकर उसके अंतरतम के प्रकाश से जोड़ देता हैप्रकृति के स्पंदन से नवरात्रि का उदयजब शीत की कठोरता विलीन होकर वसंत की कोमलता में परिवर्तित होती है, जब वृक्षों की शाखाओं पर नवांकुर हंसने लगते हैं, जब पवन में पुष्पों की गंध घुल जाती है, तब प्रकृति स्वयं एक उत्सव बन जाती है। यही वह क्षण है, जब चैत्र मास का आगमन होता है और उसके साथ आरंभ होती है नवरात्रि की अलौकिक साधना। यह केवल संयोग नहीं कि नवरात्रि इसी समय आती है। यह प्रकृति और मनुष्य के बीच गहरे संबंध का संकेत है। जैसे प्रकृति अपने पुराने पत्तों को त्यागकर नया जीवन धारण करती है, वैसे ही मनुष्य भी इन नौ दिनों में अपने भीतर की नकारात्मकताओं को त्यागकर नवचेतना का आलोक प्राप्त करता है।सनातन परंपरा में शक्ति का स्वरूपसनातन धर्म में शक्ति को सृष्टि की मूल प्रेरणा माना गया है। शिव बिना शक्ति के शून्य हैं और शक्ति बिना शिव के निष्क्रिय। यही द्वैत का अद्वैत है, जो सृष्टि को गति देता है। चैत्र नवरात्रि इसी शक्ति की उपासना का पर्व है। यह वह समय है, जब साधक देवी के विविध स्वरूपों में उस परम ऊर्जा को अनुभव करता है, जो जीवन को गति, दिशा और अर्थ प्रदान करती है। यह आराधना केवल बाह्य अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा की गहराइयों में उतरने की प्रक्रिया है।शक्ति की आराधना का महापर्वचैत्र नवरात्रि देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना का पर्व है। प्रत्येक दिन देवी के एक विशेष रूप की पूजा की जाती है। शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री। इन नौ दिनों में साधक देवी के विभिन्न रूपों की आराधना करके आत्मबल, ज्ञान और शक्ति प्राप्त करता है। यह पर्व यह संदेश देता है कि जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार तभी संभव है, जब हम भीतर की शक्ति को पहचानें।
नवरात्रि है साधना व आत्मा का उत्कर्ष
नवरात्रि के नौ दिन साधना के नौ सोपान हैं। यह यात्रा बाहरी जगत से भीतर की ओर और फिर भीतर से परम चेतना की ओर ले जाती है। पहले दिन से लेकर नवमी तक साधक क्रमशः अपने भीतर के अज्ञान, भय, मोह और अहंकार को त्यागता है। यह प्रक्रिया किसी युद्ध से कम नहीं है। यह युद्ध बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है। पहला चरण: शुद्धि—जब मन और शरीर को संयम में लाया जाता है। दूसरा चरण: स्थिरता—जब विचारों को नियंत्रित किया जाता है। तीसरा चरण: साधना—जब आत्मा ध्यान और भक्ति में लीन होती है। चौथा चरण: जागरण—जब भीतर की चेतना प्रकाशित होती है। इन नौ दिनों में व्यक्ति स्वयं को पुनः गढ़ता है, जैसे कुम्हार मिट्टी को आकार देता है।
