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ट्रांसजेंडर अधिकारों को कमजोर करने वाले ट्रांसजेंडर संशोधन बिल का बनारस में हुआ विरोध
  • 151009219 - RAVINDRA GUPTA 0 0
    20 Mar 2026 20:52 PM



वाराणसी । बनारस क्वियर प्राइड संगठन ने प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से संसद में प्रस्तावित ट्रांसजेंडर अधिकार संशोधन बिल 2026 पर बनारस के ट्रांस नागरिकों की आशंका और असहमति साझा की।

वक्ताओका कहना है कि यह संशोधन ट्रांसजेंडर और जेंडर-डाइवर्स लोगों की गरिमा,स्वायत्तता और संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करता है।

किन्नर समाज की सलमा चौधरी ने पत्रकारों स बताया कि आप किस लिंग के हैं ये आप तय करेंगे या मोदी सरकार? ऐसा कानून जो हमारी पहचान पर नियंत्रण करे, हम नहीं मानेंगे। हम सरकार से इस बिल प्रस्ताव को जल्द से जल्द रद्द करने की मांग करते हैं।

क्वियर अधिकार कार्यकर्ता टैन ने बताया कि हम इस बिल का विरोध क्यों कर रहे हैं, -1 . नागरिकों के संवैधानिक अधिकार और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के भी खिलाफ है यह विधेयक। 

यह बिल सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले NationalLegal Services Authority v. Union of India कीअवहेलना करता है।

कोर्ट ने कहा है कि हर व्यक्ति को अपनी जेंडर पहचान तय करने का अधिकार है।

इस कथन को नवतेज सिंह जोहर व यूनियन ऑफ इंडिया और सुप्रियो व यूनियन ऑफ़ इंडिया में भी दोहराया गया है।

जबकि यह कानून ट्रांस नागरिकों को मेडिकल कमेटी के भरोसे और प्रशासनिक जांच के बाबुशाही वाले भ्रष्ट और उबाऊ चैनल से गुजरने को बाध्य करता है।

(1) विभिन्न ट्रांसपहचानों की उपेक्षा विधेयक में ट्रांस व्यक्ति की परिभाषा धुंधली है, यह विधेयक कानून बना तो आशंका है कि कई ट्रांस लोगों—जैसे ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिलाएँ और अन्य नॉन-बाइनरी क्वीयर अपनी पहचान से वंचित हो जाएँगे। 

(2) सहयोग खत्म हो जाएगा, विधेयक कहता है कि “किसी को ट्रांसजेंडर बनने के लिए उकसाना अपराधहै” जबकि समाज में अपने घरो से बिछड़े हुए क्वीयर ट्रांस साथी एक दुसरे का सहयोग करते रहते हैं जो इस कानून के बनने के बाद सहयोग करना अपराध माना जाएगा।

(3) अतंरराष्ट्रीय स्वास्थ्य मानकों की अनदेखी विश्व स्वास्थ्य संगठन स्पष्ट रूप से मानता है कि जेंडर पहचान व्यक्ति की स्वयं के निर्णय और विवेक पर आधारित होती है, न कि केवल जैविक लिगं पर। हमारी संसद में प्रस्तावित बिल इस वैज्ञानिक और चिकित्सा सहमति को नजर अंदाज़ करता है।

(4) हिंसाके मामलों में कमजोर सुरक्षा बिल में ट्रांस लोगों के खिलाफ होने वाली विभिन्न प्रकार की हिंसा को एक ही धारा में रखा गया है और सजा भी भारतीय न्याय संहिता में तय सजा से काफी कम रखी गई है।

(5) ट्रांसअनुभवों को मिटाना यह बिल उन लोगों को नजर अंदाज कर रहा है जो हार्मोन थेरेपी ले रहेहैं, क्रॉस-ड्रेसर हैं, या जिन्होंने सर्जरी करवाई है या नहीं करवाई है। इससे उनकी पहचान और वास्तविक अनुभवों को नकारा जाता है।

(6) असमान सजा व्यवस्था ट्रांसलोगों के खिलाफ अपराधों पर कम सजा दी गई है, जबकि पहचान से जुड़े मामलों में कठोर सजा का प्रावधान है। इससे समदुाय का अपराधीकरण और कलंकित करने की शुरूवात होगी। 

(7) आरक्षणऔर कल्याण योजनाओं का अभाव बिल में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूदट्रांसजेंडर लोगों के लिए आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं का स्पष्ट प्रावधान नहीं है।

(8) जेंडर-अफर्मिंग हेल्थ केयर में बाधाएं आर्थिक रूप से कमजोर ट्रांसलोगों के लिए हार्मोन या सर्जरी जैसी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित नहीं की गई है। इस बिल की वजह से पहले से सीमित स्वास्थ्य सेवाएँ और कठिन हो सकतीहैं।

(9) समुदायके सहयोग तंत्र पर खतरा इस बिल के कुछ प्रावधान समुदाय के सहयोग नेटवर्क, कार्यकर्ताओं और संगठनों (CBOs) को भी अपराधी बना सकते हैं।

(10) शिक्षाऔर जागरूकता की कमी बिल में स्कूलों और विश्वविद्यालयों में जेंडर विविधता और ट्रांस पहचान के बारे में शिक्षा शामिल करने की कोई व्यवस्था नहीं है।

(11) जेंडर पहचान का मेडिकल व्यक्ति की आत्म-पहचान के बजाय मेडिकल जांच और प्रक्रियाओं को प्राथमिकता दी गई है।

(12) सामाजिक वास्तविकताओं की अनदेखी परिवार से बहिष्कार, भेदभाव, रोजगार और शिक्षा में बाधाएँ—इन वास्तविक समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया गया है।

(13) पहचान प्रमाणपत्र के लिए मेडिकल बोर्ड की बाध्यता यह प्रावधान आत्म-पहचान के अधिकारके खिलाफ है और NALSA फैसले का उल्लंघन करता है।

(14) पारंपरिकऔर क्षेत्रीय समुदायों का बहिष्कार भारत के कई सामाजिक-सांस्कृतिक समुदायों को परिभाषा से बाहर रखा जा सकता है।

इन सभी कारणों से हम आपसे अपील करते हैं कि इस मुद्दे की गंभीरता को समझें और इस भेदभावपूर्ण बिल का विरोध करें। 

अपनी आवाज़ उठाएं और ट्रांस समुदाय के सम्मान, पहचान और अधिकारों के साथ खड़े हों। हम सभी नागरिकों, क्वीयर समुदाय, सामाजिक संगठनों और साथियों से अपील करते हैं कि वे इस संशोधन बिल के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाएँ।

हमारी पहचान किसी की अनुमति या जांचपर निर्भर नहीं है। आत्म-पहचान का अधिकार हमारा मौलिक अधिकार है—और हम इसकी रक्षा करेंगे ।। रविन्द्र गुप्ता 



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