अथ स्वधास्तोत्रम् - पितरों की अधिष्ठात्री देवी स्वधा
आज वारूडी योग में करें यह अद्भुत प्रयोग - पितरों को मिलेगी मुक्ति
नमस्ते दोस्तों, आज वारूडी योग का अत्यंत दुर्लभ संयोग है। आज सूर्योदय से सूर्यास्त तक यह योग विद्यमान है। आज के दिन किए गए पितरों के निमित्त कर्मों का अक्षय पुण्य मिलता है। आज मैं आपको एक ऐसे अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र स्तोत्र के बारे में बताने जा रहा हूँ जो श्रीब्रह्मवैवर्त महापुराण के प्रकृतिखण्ड में वर्णित है। यह है स्वधास्तोत्रम् - जो पितरों की अधिष्ठात्री देवी स्वधा को समर्पित है। इस स्तोत्र के नियमित पाठ से पितर तृप्त होते हैं, पितृ दोष दूर होते हैं और पितृ बंधन से मुक्ति मिलती है। आज वारूडी योग में इस स्तोत्र का पाठ करने से पितरों को विशेष मुक्ति मिलेगी।
यह पोस्ट आप टेलीपैथी फेसबुक पेज पर पढ़ रहे हैं। पेज को फॉलो करना न भूलें ताकि आगे की महत्वपूर्ण जानकारियां आप तक पहुंचती रहें।
🌟 स्वधा देवी कौन हैं?
स्वधा देवी पितरों की अधिष्ठात्री देवी हैं। वे पितरों के लिए प्राणतुल्या हैं और ब्राह्मणों के लिए जीवनस्वरूपिणी हैं। उन्हें श्राद्ध की अधिष्ठात्री देवी कहा गया है। उन्हीं की कृपा से श्राद्ध और तर्पण आदि के फल पितरों तक पहुँचते हैं। स्वधा देवी के बिना श्राद्ध अधूरा माना जाता है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, स्वधा देवी पहले गोलोक में 'स्वधा' नामक गोपी थीं और राधिका की सखी थीं। भगवान कृष्ण ने अपने वक्षःस्थल पर उन्हें धारण किया, इसी कारण वे 'स्वधा' नाम से जानी गईं।
---
📿 स्वधास्तोत्रम् (संस्कृत)
॥ अथ स्वधास्तोत्रम् ॥
ब्रह्मोवाच -
स्वधोच्चारणमात्रेण तीर्थस्नायी भवेन्नरः।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो वाजपेयफलं लभेत् ॥१॥
स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं यदि वारत्रयं स्मरेत्।
श्राद्धस्य फलमाप्नोति कालस्य तर्पणस्य च॥२॥
श्राद्धकाले स्वधास्तोत्रं यः शृणोति समाहितः।
लभेच्छ्राद्धशतानां च पुण्यमेव न संशयः ॥३॥
स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः।
प्रियां विनीतां स लभेत्साध्वीं पुत्रं गुणान्वितम्॥४॥
पितॄणां प्राणतुल्या त्वं द्विजजीवनरूपिणी।
श्राद्धाधिष्ठातृदेवी च श्राद्धादीनां फलप्रदा ॥५॥
बहिर्गच्छ मन्मनसः पितॄणां तुष्टिहेतवे।
सम्प्रीतये द्विजातीनां गृहिणां वृद्धिहेतवे ॥६॥
नित्या त्वं नित्यस्वरूपासि गुणरूपासि सुव्रते।
आविर्भावस्तिरोभावः सृष्टौ च प्रलये तव ॥७॥
ॐ स्वस्तिश्च नमः स्वाहा स्वधा त्वं दक्षिणा तथा।
निरूपिताश्चतुर्वेदे षट् प्रशस्ताश्च कर्मिणाम् ॥८॥
पुरासीस्त्वं स्वधागोपी गोलोके राधिकासखी।
धृतोरसि स्वधात्मानं कृतं तेन स्वधा स्मृता॥९॥
इत्येवमुक्त्वा स ब्रह्मा ब्रह्मलोके च संसदि।
तस्थौ च सहसा सद्यः स्वधा साविर्बभूव ह॥१०॥
तदा पितृभ्यः प्रददौ तामेव कमलाननाम्।
तां सम्प्राप्य ययुस्ते च पितरश्च प्रहर्षिताः ॥११॥
स्वधास्तोत्रमिदं पुण्यं यः शृणोति समाहितः।
स स्नातः सर्वतीर्थेषु वेदपाठफलं लभेत् ॥१२॥
॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्तमहापुराणे प्रकृतिखण्डे ब्रह्माकृतं स्वधास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
---
🌺 स्वधास्तोत्र का हिंदी अर्थ
श्लोक 1 - 'स्वधा' शब्द के उच्चारण मात्र से मनुष्य तीर्थस्नायी हो जाता है। वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर वाजपेय यज्ञ के फल का अधिकारी हो जाता है।
श्लोक 2 - 'स्वधा, स्वधा, स्वधा' - इस प्रकार यदि तीन बार स्मरण किया जाए तो श्राद्ध, काल और तर्पण के फल पुरुष को प्राप्त हो जाते हैं।
श्लोक 3 - श्राद्ध के अवसर पर जो पुरुष सावधान होकर स्वधादेवी के स्तोत्र का श्रवण करता है, वह सौ श्राद्धों का पुण्य पा लेता है - इसमें संशय नहीं है।
श्लोक 4 - जो मनुष्य 'स्वधा, स्वधा, स्वधा' इस पवित्र नाम का त्रिकाल संध्या के समय पाठ करता है, उसे विनीत, पतिव्रता एवं प्रिय पत्नी प्राप्त होती है तथा सद्गुणसम्पन्न पुत्र का लाभ होता है।
श्लोक 5 - हे देवि! तुम पितरों के लिए प्राणतुल्या और ब्राह्मणों के लिए जीवनस्वरूपिणी हो। तुम्हें श्राद्ध की अधिष्ठात्री देवी कहा गया है। तुम्हारी ही कृपा से श्राद्ध और तर्पण आदि के फल मिलते हैं।
श्लोक 6 - तुम पितरों की तुष्टि, द्विजातियों की प्रीति तथा गृहस्थों की अभिवृद्धि के लिए मुझ ब्रह्मा के मन से निकलकर बाहर जाओ।
श्लोक 7 - हे सुव्रते! तुम नित्य हो, तुम्हारा विग्रह नित्य और गुणमय है। तुम सृष्टि के समय प्रकट होती हो और प्रलय काल में तुम्हारा तिरोभाव हो जाता है।
श्लोक 8 - तुम ॐ, नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा एवं दक्षिणा हो। चारों वेदों द्वारा तुम्हारे इन छः स्वरूपों का निरूपण किया गया है, कर्मकाण्डी लोगों में इन छहों की बड़ी मान्यता है।
श्लोक 9 - हे देवि! तुम पहले गोलोक में 'स्वधा' नामक गोपी थी और राधिका की सखी थी, भगवान कृष्ण ने अपने वक्षःस्थल पर तुम्हें धारण किया, इसी कारण तुम 'स्वधा' नाम से जानी गयी।
श्लोक 10 - इस प्रकार देवी स्वधा की महिमा गाकर ब्रह्माजी अपनी सभा में विराजमान हो गये। इतने में सहसा भगवती स्वधा उनके सामने प्रकट हो गयीं।
श्लोक 11 - तब पितामह ने उन कमलनयनी देवी को पितरों के प्रति समर्पण कर दिया। उन देवी की प्राप्ति से पितर अत्यन्त प्रसन्न होकर अपने लोक को चले गये।
श्लोक 12 - यह भगवती स्वधा का पुनीत स्तोत्र है। जो पुरुष समाहित चित्त से इस स्तोत्र का श्रवण करता है, उसने मानो सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान कर लिया और वह वेदपाठ का फल प्राप्त कर लेता है।
✨ इस स्तोत्र के अद्भुत लाभ
✅ पितरों की प्रसन्नता - इस स्तोत्र के पाठ से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं
✅ पितृ दोष निवारण - पितृ दोष से मुक्ति मिलती है
✅ पितृ बंधन मुक्ति - पितरों के सभी बंधन टूटते हैं
✅ श्राद्ध का पूर्ण फल - सौ श्राद्धों का पुण्य मिलता है
✅ पापों से मुक्ति - सम्पूर्ण पापों से मुक्ति मिलती है
✅ तीर्थ स्नान का फल - समस्त तीर्थों में स्नान का फल मिलता है
✅ वेद पाठ का फल - वेदपाठ का फल प्राप्त होता है
✅ सुयोग्य पत्नी की प्राप्ति - विनीत, पतिव्रता पत्नी मिलती है
✅ सद्गुणी पुत्र - गुणवान पुत्र की प्राप्ति होती है
✅ गृहस्थ जीवन में सुख-शांति - घर में सुख-शांति आती है
⚡ वारूडी योग विशेष - पितरों को मुक्ति का अद्भुत प्रयोग
🪷 आवश्यक सामग्री
✅ एक लोटा या कलश
✅ दूध
✅ पानी
✅ काले तिल
✅ कुशा (दर्भ)
✅ सफेद अंगोछा
✅ जनेऊ
✅ सफेद मिठाई
✅ स्वधा देवी की तस्वीर या प्रतीक
📿 वारूडी योग में स्वधास्तोत्र की साधना विधि
चरण 1 - सामग्री तैयार करें
एक लोटे या कलश में दूध, पानी, काले तिल और कुशा डाल दें। इस मिश्रण को अपने सामने रखें। यह जल पितरों और स्वधा देवी को समर्पित होगा।
चरण 2 - स्वधा देवी का स्थान
स्वधा देवी की तस्वीर या प्रतीक को लाल या सफेद कपड़े पर स्थापित करें। उन्हें सफेद फूल, सफेद चंदन और सफेद मिठाई अर्पित करें।
चरण 3 - संकल्प लें
हाथ में जल लेकर संकल्प करें -
"मैं (अपना नाम, गोत्र) अपने सभी पितरों की प्रसन्नता, पितृ बंधन से मुक्ति और पितृ दोष निवारण हेतु आज वारूडी योग के इस पवित्र अवसर पर स्वधास्तोत्र का पाठ करूंगा/करूंगी। हे स्वधा देवी! आप प्रसन्न होइए और हमारे पितरों को मुक्ति प्रदान कीजिए।"
जल को जमीन पर छोड़ दें।
चरण 4 - स्वधास्तोत्र का पाठ
अब इस स्तोत्र का 11, 21 या 51 बार पाठ करें। वारूडी योग के विशेष अवसर पर 51 बार पाठ करना सबसे उत्तम रहेगा।
चरण 5 - स्वधा देवी से प्रार्थना
पाठ के बाद हाथ जोड़कर प्रार्थना करें -
"हे स्वधा देवी! आप पितरों की अधिष्ठात्री देवी हैं। आपकी कृपा से हमारे सभी पितर तृप्त हों। उनके सभी बंधन टूटें। वे शांति से अपने लोक में विदा हों और हमें अपना आशीर्वाद दें। ॐ स्वधा देव्यै नमः।"
🌿 पीपल पर अर्पण - पितृ बंधन मुक्ति के लिए
पाठ के बाद, इस अभिमंत्रित जल (दूध, पानी, काले तिल और कुशा युक्त) को किसी पीपल के पेड़ पर अर्पित करें।
पितरों की विशेष प्रसन्नता के लिए पीपल के पेड़ पर निम्न चीजें भी अर्पित करें -
✅ जनेऊ - पीपल के पेड़ पर चढ़ाएं
✅ सफेद अंगोछा - पीपल के पेड़ पर लपेट दें
✅ सफेद मिठाई - पीपल की जड़ पर रखें
✅ सफेद फूल - पीपल के पेड़ पर चढ़ाएं
💫 पितृ बंधन मुक्ति के लिए विशेष
इस विशेष प्रयोग से पितृ बंधन दूर होता है। पितृ बंधन के कारण जीवन में आने वाली सभी बाधाएं समाप्त हो जाती हैं -
✅ पितृ बंधन मुक्ति - पितरों के सभी बंधन टूटते हैं
✅ पितृ दोष निवारण - कुंडली में मौजूद पितृ दोष दूर होता है
✅ पितरों की प्रसन्नता - पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं
✅ पितरों का आशीर्वाद - पितर परिवार को आशीर्वाद देते हैं
✅ वंश वृद्धि - परिवार में संतान सुख बढ़ता है
🌺 स्वधा देवी और पितरों का संबंध
स्वधा देवी पितरों की एकमात्र देवी हैं। वे पितरों के लिए प्राणतुल्या हैं। उनकी कृपा से पितरों को तृप्ति मिलती है। जब हम स्वधा देवी को प्रसन्न करते हैं, तो पितर स्वतः प्रसन्न होते हैं। और जब पितर प्रसन्न होते हैं, तो कुलदेवी भी प्रसन्न होती हैं। इसलिए स्वधास्तोत्र का पाठ पितरों और कुलदेवी दोनों को प्रसन्न करने का सबसे सरल उपाय है।
⚠️ महत्वपूर्ण सूचना
दोस्तों, बहुत से लोग हमारे कंटेंट को कॉपी-पेस्ट कर रहे हैं। ऐसे लोगों से सावधान रहें। हमारी पोस्ट को कॉपी करने वाले न तो सच्चे साधक हैं और न ही उन्हें साधना का कोई अधिकार। हम लगातार अपने कंटेंट को ओरिजिनल बनाए रखते हैं और आप सबसे निवेदन है कि केवल हमारे ऑफिशियल पेज और चैनल से ही जानकारी ग्रहण करें।
