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‘चल हो गौरा ऊंचे पहड़वा…’ के सुरों में सजा सुहाग का लोकमहापर्व
  • 151009219 - RAVINDRA GUPTA 0 0
    25 Feb 2026 18:35 PM



सोलह श्रृंगार, पालकी पूजन और मंगलगीतों के बीच रंगभरी एकादशी की ओर बढ़ी काशी की आस्था

वाराणसी । ‘चल हो गौरा ऊंचे पहड़वा, भोला कऽ अंगना बोलउलेबा…’ की करुण-मधुर तान जैसे ही टेढ़ीनीम की हवाओं में घुली, पूरा वातावरण सुहाग और श्रद्धा के रंग में भीग उठा। काशी की सनातन परंपरा के अनुरूप गौना आयोजन के द्वितीय दिवस पर सजी गौरा-सदनिका लोकआस्था का जीवंत आंगन बन गई, जहां सुहागिनों की थाप, वैदिक मंत्रों की गूंज और मंगलगीतों की मधुर लहरियां एक साथ स्पंदित होती रहीं।

तेल-हल्दी की पावन रस्म के बाद माता गौरा के सोलह श्रृंगार का लोकाचार केवल अनुष्ठान नहीं रहा, बल्कि अखंड सौभाग्य, दांपत्य मंगल और काशी की सांस्कृतिक आत्मा का सजीव उत्सव बन गया। रंगभरी एकादशी के आगमन से पूर्व यह क्षण मानो उस दिव्य मिलन की प्रस्तावना है, जब बाबा विश्वनाथ अपनी अर्धांगिनी को स्नेह और गौरव के साथ अपने धाम ले जाएंगे।

पालकी और सिंहासन का वैदिक पूजन रंगभरी (अमला) एकादशी, जो इस वर्ष 27 फरवरी को मनाई जाएगी, उसके पूर्व लोकाचारों की श्रृंखला पूरे विधि-विधान से निभाई जा रही है। टेढ़ीनीम स्थित गौरा-सदनिका में बाबा की पारंपरिक पालकी और सिंहासन का वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूजन किया गया।

पालकी और सिंहासन का पूजन पं. वाचस्पति तिवारी ने किया। आचार्यत्व पं. सुशील त्रिपाठी ने निभाया तथा पांच वैदिक ब्राह्मणों ने विधिवत अनुष्ठान संपन्न कराया। मंत्रध्वनि और शंखनाद से पूरा परिसर आध्यात्मिक आभा से आलोकित हो उठा।

इसी अवसर पर बाबा के मस्तक पर सजने वाला ‘देव किरीट’ भी तैयार किया गया। काठियावाड़ से आए शिव–पार्वती के राजसी परिधान भी अंतिम रूप में सजाए गए हैं, जो इस वर्ष के उत्सव को विशेष भव्यता प्रदान करेंगे।

द्वितीय दिवस पर गौनहारिनों की टोली ने मंगलगीत गाते हुए माता गौरा के सोलह श्रृंगार का बखान किया। मांग का सिंदूर, माथे की बिंदी, नथ, कर्णफूल, हार, चूड़ियां, कंगन, मेहंदी, पायल और बिछिया—हर आभूषण का महत्व गीतों के माध्यम से समझाया गया।

महिलाओं ने बताया कि सोलह श्रृंगार केवल बाह्य सौंदर्य नहीं, बल्कि दांपत्य की स्थिरता, परिवार की समृद्धि और समाज की मंगलकामना का प्रतीक है।

महाशिवरात्रि पर महाशिवरात्रि के अवसर पर शिव–पार्वती विवाह की रस्म विश्वनाथ मंदिर के महंत आवास पर लोकपरंपरानुसार संपन्न हुई थी। विवाह के उपरांत महंत आवास ‘गौरा-सदनिका’ में परिवर्तित हो जाता है, जहां गौने तक विविध लोकाचार होते हैं।

महंत पुत्र पं. वाचस्पति तिवारी ने बताया कि काशी में गौना उत्सव, विवाहोपरांत प्रथम विदाई और पुनर्मिलन की सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक है। रंगभरी एकादशी को बाबा विश्वनाथ माता गौरा को ससम्मान अपने धाम ले जाते हैं। यह क्षण काशीवासियों के लिए अत्यंत भावुक और उल्लासपूर्ण होता है।

मान्यता है कि विवाह के पश्चात जब भगवान शिव पहली बार माता पार्वती को काशी लाते हैं, तब पूरा नगर अबीर-गुलाल और पुष्पवर्षा से उनका स्वागत करता है। पालकी यात्रा में बाबा विश्वनाथ, माता पार्वती और प्रथमेश की चल प्रतिमाएं नगर भ्रमण करती हैं।

ढोल-नगाड़ों, शहनाई और हर-हर महादेव के उद्घोष के बीच श्रद्धालु रंगों की बौछार कर अपने आराध्य का अभिनंदन करते हैं ।।



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