मुहम्मदाबाद गोहना, मऊ। स्थानीय ब्लॉक अन्तर्ग तिलसवां स्थित दुर्गा मंदिर परिसर में चल रहे शतचंडी महायज्ञ के पावन अवसर पर श्रीराम कथा के पांचवें दिन ऐसा लगा मानो समय ठहर गया हो और त्रेता युग की स्मृतियाँ वर्तमान में उतर आई हों। गुरुवार को कथा व्यास कौशिक महाराज ने जब श्रीराम के वनगमन का प्रसंग छेड़ा, तो शब्द मात्र कथा न रहकर करुणा, त्याग और मर्यादा की जीवंत धारा बन गए।
राजमहल की सुख-सुविधाओं को त्याग कर पिता की आज्ञा के लिए वन की राह चुनने वाले राम का चित्रण इतना मार्मिक था कि पंडाल में बैठे श्रद्धालुओं की आंखें स्वतः ही सजल हो उठीं। लगा जैसे हर हृदय स्वयं अयोध्या बन गया हो और हर मन में राम विराजमान हों।
केवट प्रसंग का वर्णन करते हुए महाराज ने बताया कि प्रभु का प्रेम किसी सीमा, किसी जाति, किसी वर्ग में बंधा नहीं था। वनवासी हों या निषाद, वानर हों या सामान्य जन राम ने सबको गले लगाया, सबको सम्मान दिया। यही तो रामत्व है, जो भेद नहीं, भाव देखता है; जो पद नहीं, प्रेम को पहचानता है।
उन्होंने कहा, राम कथा केवल अतीत की स्मृति नहीं, वर्तमान का पथप्रदर्शक है। यह हमें सिखाती है कि समाज की सच्ची शक्ति समरसता, सौहार्द और सहयोग में निहित है। यदि हम सब मिलकर राष्ट्रहित और लोकमंगल की भावना से आगे बढ़ें, तो हर घर, हर गांव में रामराज्य की आभा झलक सकती है। रिपोट - अजय सिंह 151170379
