ससुर ने किया अपनी ही बहू से रेप 😯 उत्तर प्रदेश का कानपुर जिला अपनी औद्योगिक पहचान के लिए जाना जाता है, लेकिन इसके शांत ग्रामीण अंचलों में भी कभी-कभी ऐसी कहानियाँ जन्म लेती हैं जो समाज की रूह को झकझोर देती हैं। ऐसी ही एक घटना कानपुर के श्रवणखेड़ा गाँव की है, जहाँ एक प्रतिष्ठित परिवार के भीतर छिपे अंधकार ने सब कुछ तबाह कर दिया।
एक संपन्न परिवार की नींव
श्रवणखेड़ा गाँव के रहने वाले जिले सिंह एक मेहनती किसान थे। उनके पास 16 एकड़ उपजाऊ जमीन थी, जिससे उनका परिवार गाँव के संपन्न परिवारों में गिना जाता था। जिले सिंह ने वर्षों के परिश्रम से न केवल खेती को संवारा था, बल्कि अपने बच्चों के भविष्य के लिए अच्छी खासी बचत भी कर रखी थी।
जिले सिंह के दो बेटे थे। बड़े बेटे का नाम अजय था और छोटे का नाम आनंद। अजय बचपन से ही अनुशासित और साहसी था, इसलिए उसने भारतीय सेना को अपना कार्यक्षेत्र चुना। वह पिछले चार वर्षों से देश की सीमाओं पर तैनात था और साल में कुछ ही बार छुट्टी लेकर गाँव आता था। छोटा बेटा आनंद, घर पर ही रहकर अपने पिता के साथ खेती-किसानी का हाथ बँटाता था।
करीब तीन साल पहले, जिले सिंह ने अजय की शादी 'कल्पना' नाम की एक बहुत ही सुशील और मेहनती युवती से करवाई थी। कल्पना ने आते ही घर की बागडोर संभाल ली। वह न केवल एक आदर्श बहू थी, बल्कि अपने ससुर और देवर की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ती थी।
विश्वास के पीछे का अंधकार
दिसंबर 2025 का महीना था। गाँव में सर्दी की दस्तक हो चुकी थी। अजय सात दिनों की छुट्टी लेकर घर आया था। घर में खुशियों का माहौल था। अजय अपनी पत्नी कल्पना को शहर घुमाने ले गया, उसके लिए नए कपड़े खरीदे और अपने भाई आनंद व पिता के लिए भी उपहार लाए। वह खुश था कि उसका परिवार सुरक्षित और खुशहाल है। लेकिन उसे भनक तक नहीं थी कि उसके पीछे उसके अपने ही घर में क्या पक रहा है।
12 दिसंबर को अजय वापस अपनी ड्यूटी पर चला गया। घर फिर से शांत हो गया। 15 दिसंबर की सुबह, जब आसमान से हल्की बारिश हो रही थी, जिले सिंह और आनंद छाता लेकर खेतों की ओर चले गए। पीछे से कल्पना ने घर के कामकाज निपटाए और कपड़े धोकर छत पर सूखने डाल दिए। अचानक बारिश तेज हो गई और कल्पना छत पर कपड़े समेटने गई।
भीगते हुए जब वह नीचे आई और अपने कमरे में वस्त्र बदलने लगी, तभी आनंद अचानक कमरे में दाखिल हुआ। उसने न तो आवाज दी और न ही दरवाजा खटखटाया। उस पल आनंद की दृष्टि में जो दोष आया, उसने पवित्र 'देवर-भाभी' के रिश्ते को कलंकित करने की नींव रख दी। कल्पना ने उसे फटकारा और बाहर जाने को कहा, लेकिन आनंद के मन में दुर्भावना घर कर चुकी थी।
शोषण की असहनीय दास्तां
उसी दोपहर कल्पना की माँ ने फोन किया कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है। कल्पना ने आनंद से उसे मायके छोड़ने को कहा। रास्ते में, एक सुनसान इलाके में आनंद ने मोटरसाइकिल रोकी और अपनी भाभी के साथ अत्यंत अमर्यादित और हिंसक व्यवहार किया। उसने कल्पना को धमकी दी कि यदि उसने यह बात किसी को बताई, तो वह उसे बदनाम कर देगा और जान से मार देगा।
कल्पना डर गई। वह चुपचाप अपने मायके गई और अपनी माँ की सेवा की, लेकिन अपने भीतर के घावों को छिपा लिया। 19 दिसंबर को जब जिले सिंह उसे लेने पहुँचे, तो रास्ते में वही दोहराव हुआ। जिले सिंह, जिन्हें कल्पना एक पिता के समान मानती थी, उनके मन में भी विकार उत्पन्न हो गया। गाँव की सीमा पर स्थित अपने ही खेत के एक कमरे में उन्होंने अपनी बहू के साथ बलपूर्वक दुर्व्यवहार किया।
अब कल्पना के लिए घर एक जेल बन गया था। जिस घर में वह सुरक्षा की उम्मीद करती थी, वहीं उसके रक्षक भक्षक बन चुके थे। देवर और ससुर, दोनों ने उसे डरा-धमकाकर उसका शोषण करना जारी रखा। वह असहाय थी, अकेली थी और समाज के डर से चुप थी.
