EPaper Join LogIn
एक बार क्लिक कर पोर्टल को Subscribe करें खबर पढ़े या अपलोड करें हर खबर पर इनकम पाये।

विकसित भारत के अग्रदूतों के भविष्‍य को संवारना :धर्मेंद्र प्रधान
  • 151000001 - PRABHAKAR DWIVEDI 0 0
    04 Feb 2026 21:54 PM



इस वर्ष परीक्षा पे चर्चा का आयोजन भारत की शिक्षा यात्रा में शांत लेकिन निर्णायक परिवर्तन को रेखांकित करता है। माननीय प्रधानमंत्री के नेतृत्व में परिकल्पित यह पहल, जो 2018 में एक एकल वार्षिक संवाद के रूप में प्रारंभ हुई थी, आज स्वाभाविक रूप से एक जन आंदोलन का रूप ले चुकी है। अब यह एक राष्ट्रव्यापी सामूहिक प्रयास बन गई है, जिसमें विद्यार्थियों के समग्र कल्याण को केंद्र में रखा गया है और माता-पिता व शिक्षक इस साझा उत्तरदायित्व के सक्रिय सहभागी हैं।
इस वर्ष की सहभागिता का पैमाना इस पहल की गहराई को दर्शाता है। 4.5 करोड़ से अधिक पंजीकरणों के साथ परीक्षा पे चर्चा, पूर्व गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड को पीछे छोड़ते हुए अब जन-संपर्क से आगे बढ़कर सामूहिक स्वामित्व की एक महत्वपूर्ण अवस्था में प्रवेश कर चुकी है। यह अभूतपूर्व सहभागिता सक्षम वातावरण निर्मित करने के सामूहिक संकल्प को प्रतिबिंबित करती है, जहाँ प्रत्येक बच्‍चा सीख सके, विकसित हो सके और सही मायनों में फल-फूल सके।
प्रधानमंत्री के प्रेरक नेतृत्व का प्रदर्शन
प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी का शिक्षा, अध्‍ययन और परीक्षा से जुड़े तनाव जैसे विषयों पर विद्यार्थियों के साथ संवाद सहानुभूति, व्यवहारिकता और प्रेरक नेतृत्व का विशिष्ट समन्वय प्रस्तुत करता है। सरलता, अनुशासन, आशावाद और मानव क्षमता में गहरी आस्था से परिपूर्ण उनके व्यक्तित्व ने लाखों बच्‍चों के मन पर गहरा और स्थायी प्रभाव अंकित किया है। औपचारिक प्रोटोकॉल की जटिलताओं से परे जाकर विद्यार्थियों से मार्गदर्शक, मेंटर और शुभचिंतक के रूप में जुड़ने की सहज क्षमता प्रधानमंत्री को विशिष्ट बनाती है। उनकी संवादात्मक, कथात्मक और आत्मीय शैली विद्यार्थियों को यह अनुभव कराती है कि उनकी बातें सुनी और समझी जा रही हैं। वे गर्मजोशी, हास्य और प्रामाणिकता के साथ संवाद करते हैं तथा अक्सर अपने जीवन के अनुभवों से उदाहरण लेकर धैर्य, एकाग्रता और आत्मबल जैसे व्यापक जीवन मूल्यों को सरलता से प्रस्तुत करते हैं। यह व्यक्तिगत स्पर्श परीक्षा से जुड़े दबावों को सहज बनाते हुए आश्वस्त और सकारात्मक वातावरण का निर्माण करता है, जहाँ विद्यार्थी आत्मविश्वास के साथ सीखने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित होते हैं।
प्रत्येक बच्चे की विशिष्टता की पहचान
इस प्रयास के केंद्र में एक सरल किंतु अत्यंत सशक्त सत्य निहित है: हर बच्चा विशिष्‍ट है। प्रत्येक बच्चा अलग तरह से सीखता है, अपनी गति से आगे बढ़ता है और अपने भीतर ऐसी प्रतिभाएँ समेटे होता है, जिन्हें अंकों या रैंक तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
परीक्षाएँ अपनी प्रकृति के अनुसार, बच्चे की क्षमता के सीमित पहलू को ही दर्शाती हैं। समग्र व्यक्तित्व के निर्माण के माध्यम से ही उसकी वास्तविक सृजनात्मकता और उत्कृष्टता का विकास होता है। कोई बच्चा गणित में उत्कृष्टता दिखा सकता है, कोई कलात्मक कल्पना में निपुण हो सकता है, और कोई करुणा के साथ संवेदनशील चिकित्सक बनने की क्षमता रखता है। ये भिन्नताएँ किसी तरह की कमी नहीं हैं; बल्कि यही विविध, सशक्त और नवोन्मेषी समाज की आधारशिला हैं।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 के दर्शन का प्रतिबिंब
यह दर्शन राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 के मूल में निहित है। इसके ढाँचे के अंतर्गत शिक्षण-पद्धतियों, पाठ्यक्रमों और मूल्यांकन प्रणालियों को एक वास्तविक बाल-केंद्रित दृष्टिकोण के अनुरूप पुनर्गठित किया जा रहा है, जहाँ शैक्षणिक अध्‍ययन के साथ-साथ सृजनात्मकता, आलोचनात्मक चिंतन, भावनात्मक बुद्धिमत्ता, शारीरिक स्वास्थ्य और नैतिक मूल्यों के संवर्धन पर विशेष बल दिया गया है। प्रारंभिक वर्षों में खेल-आधारित शिक्षण पर इसका जोर इस तथ्य को स्वीकार करता है कि जिज्ञासा और आनंद ही आजीवन सीखने की सबसे सशक्त आधारशिलाएँ हैं।
शिक्षा के आरंभिक वर्षों में मातृभाषा में शिक्षा देने का उद्देश्य बच्चों को अवधारणाओं की बेहतर समझ प्रदान करना है, जबकि बहुभाषिकता पर दिया गया बल ऐसी पीढ़ी के निर्माण की परिकल्पना करता है जो अपनी सांस्कृतिक और भाषायी जड़ों के प्रति विश्वास रखती हो तथा भारतीय ज्ञान परंपराओं को वैश्विक मंच पर आगे बढ़ाने में सक्षम हो।
मूल्यांकन संबंधी सुधार भी इसी उद्देश्य को प्रतिबिंबित करते हैं। पहली बार कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षाएँ अब वर्ष में दो बार आयोजित की जाएँगी, जिससे विद्यार्थियों को अपने प्रदर्शन में सुधार के लिए अधिक लचीलापन मिलेगा और उच्च-दबाव वाली एकल परीक्षा से जुड़ा तनाव कम होगा। 360-डिग्री समग्र प्रगति कार्ड लागू किए गए हैं, जो केवल बच्चे की शैक्षणिक उपलब्धियों का ही आकलन नहीं करते, बल्कि उसके सामाजिक-भावनात्मक और शारीरिक विकास को भी समग्र रूप से दर्ज करते हैं। यह स्वीकार करते हुए कि तंदुरुस्‍ती सीखने का अभिन्न अंग है, प्रत्येक सीबीएसई विद्यालय में सामाजिक-भावनात्मक परामर्शदाताओं की नियुक्ति अनिवार्य की गई है, जो विद्यार्थियों को शैक्षणिक और भावनात्मक तनाव के प्रबंधन में निरंतर सहयोग प्रदान करेंगे। अंत में, हमारे समक्ष उत्तरदायित्व स्पष्ट है—बच्चों को किसी एक साँचे में ढलने के लिए वि‍वश नहीं करना चाहिए, बल्कि प्रत्येक बच्चे की विशिष्ट क्षमताओं को पहचानना, उनका समर्थन करना और उन्हें सुदृढ़ बनाना चाहिए।

समग्र रूप से सीखना – प्रमुख केंद्रबिंदु
आज की शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों, परीक्षाओं और रटने तक सीमित नहीं रह गई है। समग्रता से सीखने पर स्पष्ट रूप से ध्यान दिया जा रहा है। यह भली-भाँति समझा जा चुका है कि केवल शैक्षणिक उत्कृष्टता विद्यार्थियों को 21वीं सदी की चुनौतियों के लिए तैयार नहीं करती। चिंता, भय या भावनात्मक तनाव के बोझ तले बच्चे सार्थक रूप से नहीं सीख सकते। भारत की सभ्यतागत परंपराएँ इस स्थिति से निपटने के लिए पूर्ण जागरूकता या माइंडफुलनेस, प्राणायाम और योग जैसे स्थायी साधन प्रदान करती हैं। ये अभ्यास बच्चों को अपनी भावनाओं को बेहतर ढंग से समझने में मदद करते हैं और एकाग्रता, शांति और लचीलेपन का निर्माण करते हैं। परीक्षा की तैयारी में सहायक होने के अलावा, ये अभ्यास जीवन कौशल विकसित करते हैं जो कक्षा के परे भी काम आते हैं—ताकि शैक्षणिक ज्ञान के साथ-साथ भावनात्मक बुद्धिमत्ता, प्रकृति के साथ संतुलन और आंतरिक जागरूकता को भी सुदृढ़ बनाया जा सके।
चुनौतियों का समाधान
फिर भी, हमें आज की एक विशिष्ट आधुनिक चुनौती—अत्यधिक डिजिटल उपयोग और स्क्रीन टाइम का सामना करना है । लंबे समय तक लगातार डिजिटल उपकरणों के संपर्क में रहने से ध्यान की क्षमता कम होती है, नींद में बाधा आती है और मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। लगातार कनेक्टिविटी, ऑनलाइन तुलना और डिजिटल अतिप्रेरणा का दबाव अक्सर परीक्षा के तनाव को बढ़ा देता है और उस माइंडफुलनेस को कमजोर कर देता है, जिसे हम बच्चों में विकसित करना चाहते हैं। यहीं पर माता-पिता और शिक्षक मिलकर भूमिका निभा सकते हैं। उपकरणों के उपयोग के लिए सुरक्षित सीमाएँ तय करके, साथ ही शारीरिक गतिविधियों, सृजनात्मक प्रयासों और पारिवारिक संवाद जैसे विकल्पों के प्रति प्रोत्साहित करके हम पुन: संतुलन स्थापित कर सकते हैं।
बच्चे – प्रगति के अग्रदूत
विकसित भारत के लिए सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता आवश्यक है। जब बच्चे अपनी विशिष्ट क्षमताओं को खोजने और उनका विकास करने के लिए स्वतंत्र होते हैं, तो राष्ट्र सृजनात्मकता, समावेशिता और सामूहिक प्रगति के माध्यम से आगे बढ़ता है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस युग में जिज्ञासा और समस्या-समाधान के बीच का फासला घट गया है। शिक्षकों, माता-पिता और संरक्षकों के रूप में हमारे लिए यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि बच्‍चे इस खोज में सक्षम बन सकें। इसके लिए आवश्यक है कि बच्चों को सही उपकरण, स्पष्ट सुरक्षा प्रदान की जाए तथा प्रयोग करने, नवाचार करने यहाँ तक कि असफल होने तक की स्वतंत्रता देते हुए उनका निरंतर मार्गदर्शन और सहयोग किया जाए।
आज के बच्चे विकसित भारत 2047 के अग्रदूत हैं। जो बच्चे निर्भय होकर सीखते हैं, आत्मविश्वास के साथ नवाचार करते हैं, और अपनी सांस्कृतिक जड़ों में स्थिर रहते हुए दुनिया से जुड़ते हैं, वे ही वर्तमान में विकसित भारत का निर्माण कर रहे हैं। ऐसे बच्चों का समर्थन एक ऐसी शिक्षा प्रणाली के माध्यम से किया जाना चाहिए, जो मन, हृदय और हाथ—तीनों के विकास पर केंद्रित हो; एक ऐसी प्रणाली जो प्रतिभा का उत्सव मनाए, उद्देश्य को पोषित करे, और उन्हें सार्थक जीवन के लिए तैयार करे। यही है परीक्षा पे चर्चा की भावना: बच्‍चों को भय से मुक्त करना और उन्हें भारत@2047 के लिए आत्मविश्वासी नागरिक के रूप में तैयार करना।
*
(लेखक भारत सरकार में शिक्षा मंत्री हैं)



Subscriber

188459

No. of Visitors

FastMail

VARANASI - यूजीसी को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू, काशी में छात्रों और विभिन्न संगठनों ने दी चेतावनी     Sonbhadra - यूजीसी की नीतियों के खिलाफ सवर्ण आर्मी का प्रदर्शन, ज्ञापन सौंपकर जताया विरोध     बुलंदशहर - डिलीवरी के दौरान नवजात की गर्दन हुई धड़ से अलग, मां के गर्भाशय में ही रह गया गला     BALLIA - सरस्वती पूजा में शामिल होने के लिए निकला था युवक, पेड़ से लटकता मिला शव     VARANASI - नेपाल भागने की फिराक में था विकास सिंह नरवे