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संस्कृत संस्कृति के उत्थान के कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के भूमिका का निर्वहन करते हुए देवेन्द्र जी महाराज ने बताया संस्कृत का महत्व।
  • 151114592 - DEVENDRA CHATURVEDI 0 0
    28 Nov 2025 17:26 PM



संस्कृत संस्कृति के उत्थान के कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के भूमिका का निर्वहन करते हुए देवेन्द्र जी महाराज ने बताया संस्कृत का महत्व। यह बहुत प्राचीन और व्यापक भाषा है, जिसमें कई पुराण, महापुराण और उपनिषद हैं। वास्तव में संस्कृत ऐसी भाषा है, जो लोगों को मूल वेदों के साथ-साथ कई अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथों को भी मूल देवनागरी अथवा उसी संस्कृत भाषा में पढ़ने का अवसर प्रदान करती है, जिसमें वे लिखे गए हैं। भारत की समृद्ध संस्कृति की प्रतीक संस्कृत समस्त भारतीय भाषाओं की जननी मानी जाती है, जो भारत में बोली जाने वाली प्राचीन भाषाओं में पहली है। भारत की कुछ प्राचीन लोककथाएं संस्कृत भाषा में ही हैं। संस्कृत की विशेषता के बारे में माना जाता है कि कोई व्यक्ति संस्कृत में केवल एक शब्द में ही स्वयं को व्यक्त कर सकता है। कुछ शोधकर्ताओं द्वारा संस्कृत को दो खण्डों (वैदिक संस्कृत तथा शास्त्रीय संस्कृत) में वर्गीकृत किया गया है। संगीत में संस्कृत का उपयोग अधिकाशतः हिन्दुस्तानी और कर्नाटक शास्त्रीय संगीत में ही किया जाता है। संस्कृत भाषा में करीब 102 अरब 78 करोड़ 50 लाख शब्दों की सबसे बड़ी शब्दावली है और इस भाषा की एक संगठित व्याकरणिक संरचना भी है, जिसमें स्वर और व्यंजन भी वैज्ञानिक पैटर्न में व्यवस्थित होते हैं। संस्कृत को भारत के संविधान की 8वीं अनुसूची में सम्मिलित किया गया है और उत्तराखण्ड में तो यह राज्य की दूसरी आधिकारिक भाषा के रूप में घोषित की गई है। कर्नाटक में शिमोगा जिले में मत्तूर नामक एक ऐसे गांव के बारे में भी जानकारी मिलती है, जहां प्रत्येक व्यक्ति संस्कृत में बात करता है। बहरहाल, यदि इन कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो संस्कृत का उपयोग वर्तमान समय में केवल पूजा-पाठ, अनुष्ठानों तथा शैक्षणिक गतिविधियों तक ही सीमित होकर रह गया है और इसे पढ़ने, लिखने तथा समझने वाले लोगों की संख्या निरन्तर कम हो रही है। सही मायनों में संस्कृत केवल एक भाषा ही नहीं है बल्कि एक विचार, एक संस्कृति, एक संस्कार भी है, जिसमें विश्व का कल्याण, शांति, सहयोग और वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना निहित है। इसलिए अत्यंत जरूरी है कि अब देश में विदेशी भाषाओं और अंग्रेजी का महत्व अत्यधिक बढ़ जाने के कारण अपना अस्तित्व खोती इस देवभाषा को बढ़ावा देने के लिए समुचित कदम उठाए जाएं। भारतीय संस्कृति की धड़कन और सभ्यता के मूल में समाई संस्कृत केवल संचार का माध्यम नहीं बल्कि सनातन सृष्टि का आधार है। जब हम ‘संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, भारत की सनातन आत्मा की अभिव्यक्ति है’ कहते हैं तो उसमें निहित सत्य हमें भारतीय इतिहास, वेदों की परंपरा, परिष्कृत ज्ञान-विज्ञान और विश्व को दिए गए अमर संदेश की याद दिलाता है। विश्व  इसी सनातन आत्मा के उद्भव, विस्तार और पुनरुद्धार का संकल्प है। यह दिन हमसे यह आग्रह करता है कि हम संस्कृत को केवल स्मृतियों में कैद न करें बल्कि व्यवहार का अंग बनाएं ताकि यह देवभाषा पुनः भारत की सांस्कृतिक पहचान का गौरव बनेसंस्कृत की यात्रा विचार, ज्ञान, कला, साहित्य, विज्ञान, अध्यात्म, दर्शन, संस्कृति, हर क्षेत्र से होकर गुजरती है। सतत प्रवाहमान, वैज्ञानिक, सौंदर्यपूर्ण, परिष्कृत और मंथनशील संस्कृत भारत के अतीत, वर्तमान और भावी संस्कृति को जोड़ने वाली जीवंत कड़ी है। केवल वृद्धों, विद्वानों या पुरोहितों की धरोहर न रहकर यह आज युवा पीढ़ी की ऊर्जा, नूतन भारत की प्रेरणा और विश्व की चेतना का माध्यम बन सकती है। इस यात्रा में प्रत्येक व्यक्ति, संस्थान, समाज, सरकार, वैश्विक मंच, तकनीकी समुदाय, शिक्षक, विद्यार्थी, अभिभावक, और संस्कृत प्रेमी, सबका उत्तरदायित्व है कि वे केवल सांस्कृतिक गौरव की बात कर संतुष्ट न रहें बल्कि संस्कृत को व्यवहार, शिक्षा, संवाद, नवाचार की धारा में उतारें। जब भारतवासी और विश्ववासी इसे पुनः अपना लेंगे, तब संस्कृत पुनः युगों तक भारत की सनातन आत्मा का घोष बन जाएगी।

 



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