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मंडल रेल प्रबंधक कार्यालय के हिन्दी वाचनालय में मुंशी प्रेमचंद एवं संत गोस्वामी तुलसीदास की जयंती का आयोजन किया गया
  • 151000001 - PRABHAKAR DWIVEDI 544 7866
    31 Jul 2025 23:55 PM



वाराणसी 31, जुलाई 2025; मंडल रेल प्रबंधक कार्यालय के हिन्दी वाचनालय में राजभाषा विभाग के तत्वावधान में हिंदी साहित्य के महान साहित्यकार, 'उपन्यास सम्राट' मुंशी प्रेमचंद एवं रामचरितमानस के रचयिता, भक्ति और मर्यादा के पुजारी, संत गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ वरिष्ठ मंडल आंकड़ा एवं संसाधन प्रबंधक सह राजभाषा अधिकारी श्री नवनीत कुमार वर्मा द्वारा गोस्वामी तुलसीदास जी एवं मुंशी प्रेमचंद के चित्र पर माल्यार्पण कर किया गया। तदुपरांत कर्मचारियों ने भी दोनों महान साहित्यकारो के चित्र पर पुष्पांजलि समर्पित कर उनकी रचनाओं का पाठन कर श्रद्धांजलि दी ।
तुलसी जयंती एवं मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर राजभाषा अधिकारी श्री वर्मा ने प्रेमचंद एवं तुलसीदास जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए हिन्दी साहित्य एवं धर्म के क्षेत्र में उनके योगदान पर प्रकाश डाला । उन्होंने अपने संबोधन में कहा बताया कि सम्पूर्ण भारतवर्ष में महान ग्रंथ रामचतिमानसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास के स्मरण में तुलसी जयंती मनाई जाती है। श्रावण मास की अमावस्या के सातवें दिन तुलसीदास की जयंती मनाई जाती है। इस वर्ष यह तिथि 31 जुलाई है। गोस्वामी तुलसीदास ने कुल 12पुस्तकों की रचना की है, लेकिन सबसे अधिक ख्याति उनके द्वारा रचित रामचरितमानस को मिली। दरअसल, इस महान ग्रंथ की रचना तुलसी ने अवधीभाषा में की है और यह भाषा उत्तर भारत के जन-साधारण की भाषा है। इसीलिए तुलसीदास को जन-जन का कवि माना जाता है।
धनपत राय श्रीवास्तव ( ३१ जुलाई १८८० – ८ अक्टूबर १९३६) जो प्रेमचंद नाम से जाने जाते हैं, वो हिन्दी और उर्दू के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार, कहानीकार एवं विचारक थे। उन्होंने सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, निर्मला, गबन, कर्मभूमि, गोदान आदि लगभग डेढ़ दर्जन उपन्यास तथा कफन, पूस की रात, पंच परमेश्वर, बड़े घर की बेटी, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा आदि तीन सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं। उनमें से अधिकांश हिन्दी तथा उर्दू दोनों भाषाओं में प्रकाशित हुईं। उन्होंने अपने दौर की सभी प्रमुख उर्दू और हिन्दी पत्रिकाओं जमाना, सरस्वती, माधुरी, मर्यादा, चाँद, सुधा आदि में लिखा। उन्होंने हिन्दी समाचार पत्र जागरण तथा साहित्यिक पत्रिका हंस का संपादन और प्रकाशन भी किया। इसके लिए उन्होंने सरस्वती प्रेस खरीदा जो बाद में घाटे में रहा और बन्द करना पड़ा। प्रेमचंद फिल्मों की पटकथा लिखने मुंबई आए और लगभग तीन वर्ष तक रहे। जीवन के अंतिम दिनों तक वे साहित्य सृजन में लगे रहे। महाजनी सभ्यता उनका अंतिम निबन्ध, साहित्य का उद्देश्य अन्तिम व्याख्यान, कफन अन्तिम कहानी, गोदान अन्तिम पूर्ण उपन्यास तथा मंगलसूत्र अन्तिम अपूर्ण उपन्यास माना जाता है।
इस अवसर पर कार्मिक विभाग से विशाल कुमार मिश्र, अमन श्रीवास्तव, अनु रानी राव,शिवानी सिंह,आशा शर्मा, परिचालन विभाग से पूनम श्रीवास्तव, गायत्री यादव, आरती कुमारी, उर्मिला गुप्ता राजभाषा विभाग से श्रीमती पूनम त्रिपाठी, श्रीमती ममता यादव, अजय कुमार सिंह, अमित कुमार साव, दिव्या शर्मा, यांत्रिक (समाडि) से श्रीमती अनीता तिवारी, श्रीमती आरती वर्मा, श्रीमती पूनम तिवारी, श्रीमती आशा सिंह, श्रीमती अंजू मिश्रा, संरक्षा विभाग से श्रीमती रीना सिंह एवं बड़ी संख्या में पर्यवेक्षक एवं कर्मचारीगण उपस्थित रहें। कार्यक्रम के अंत में राजभाषा विभाग से श्रीमती पूनम त्रिपाठी ने उपस्थित सभी लोगों का धन्यवाद ज्ञापन किया। अशोक कुमार जनसंपर्क अधिकारी, वाराणसी



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