सुप्रीम कोर्ट द्वारा 9 मई को दिया गया आदेश कई वजहों से उल्लेखनीय है। इस आदेश में दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया गया, जिसमें विकिमीडिया फाउंडेशन को अपने विकिपीडिया इंटरनेट विश्वकोश से एक पृष्ठ हटाने का निर्देश दिया गया था। अक्टूबर 2024 में, हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने विकिपीडिया के उपयोगकर्ताओं द्वारा मानहानि मामले का विवरण देने वाला एक नया पृष्ठ व एक चर्चा मंच शुरू करने तथा उसपर कुछ उपयोगकर्ताओं द्वारा एकल न्यायाधीश के आदेश पर प्रतिकूल टिप्पणी करने के बाद अंतरिम आदेश जारी किया था और इन कार्यों को अवमानना माना था। एक खंडपीठ द्वारा उक्त आदेश को बरकरार रखे जाने के बाद, फाउंडेशन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इसके बाद, न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुयान की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि “बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे पर लोगों और प्रेस द्वारा जोरदार बहस की जरूरत है, भले ही बहस का मुद्दा अदालत के समक्ष विचाराधीन ही क्यों न हो” और हाईकोर्ट ने फोरम में हटाने संबंधी अपने आदेश की प्रतिकूल टिप्पणियों पर ज़रूरत से ज़्यादा प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। हटाए जाने के आदेश की वैधता पर फाउंडेशन की अपील तक ही सीमित पीठ का यह आदेश अप्रैल में एएनआई के विकिपीडिया पेज पर कथित रूप से अपमानजनक संपादनों को हटाने के आदेश को रद्द करने के जैसा ही था। फिर भी इस आदेश में यह भी स्पष्ट है कि जानने का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(ए) और 21 के तहत एक बुनियादी अधिकार है और यह फाउंडेशन के खिलाफ मामले को ऐसे आलोक में देखता है, जो शायद हाईकोर्ट को समझ में नहीं आया। अवमानना की धारणा पर चर्चा करते हुए, न्यायमूर्ति ओका और भुयान ने कहा कि जानने का अधिकार लोगों की सार्वजनिक विकास में भाग लेने और न्याय तक पहुंच बनाने की क्षमता को नियंत्रित करता है।चूंकि एएनआई का मुकदमा जारी है, लिहाजा हाईकोर्ट सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत फाउंडेशन की मध्यस्थ की स्थिति के सवाल पर जानने के अधिकार के मूल्य को लागू करने पर विचार कर सकता है। फाउंडेशन सिर्फ विकिपीडिया के उन उपयोगकर्ताओं को तकनीकी अवसंरचना उपलब्ध कराता है, जो इस विश्वकोश को बनाए रखने से संबंधित दिशानिर्देशों के एक सेट के अनुसार काम करते हैं। यह व्यवस्था उपयोगकर्ताओं को स्वतंत्र रूप से कार्य करने की इजाजत देता है, हालांकि दिशानिर्देश स्पष्ट हैं कि विकिपीडिया सिर्फ अन्य स्रोतों से जानकारी एकत्रित व व्यवस्थित करेगा और अपनी खुद की नई थीसिस विकसित नहीं करेगा। इस तरह,फाउंडेशन पीड़ित शक्तिशाली लोगों के प्रतिशोध के खिलाफ उपयोगकर्ताओं की रक्षा करके और मंच के लोकतांत्रिक उपकरण के जरिए उनके योगदान की गुणवत्ता को बढ़ाकर लोगों के जानने के अधिकार को पूरा करता है। हरेक मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष जानने के अधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार को बरकरार रखा जाना चाहिए। जैसा कि न्यायाधीशों ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ द्वारा उद्धृत जेरेमी बेंथम के कथन को दोहराते हुए कहा: “अदालती कार्यवाही के बारे में प्रचार ... न्यायाधीश को, मुकदमा चलाने के दौरान, परीक्षण के अधीन रखता है।”