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लखनऊ - केशव प्रसाद ने सपा को बताया सांपनाथ तो कांग्रेस को नागनाथ, बोले- विपक्ष हमारे मनोबल के आगे नहीं टिक सकता     मुंबई - महाराष्ट्र की राजनीति में हलचल तेज, Ajit गुट के नेता ने की शरद पवार से मुलाकात     जम्मू - अमरनाथ धाम के लिए श्रद्धालुओं में गजब का उत्साह, 18वें जत्थे में इतने भक्त हुए रवाना     नाहन - नशे के खिलाफ सिरमौर पुलिस का एक्‍शन, एक परिवार के तीन लोग गिरफ्तार; भारी मात्रा में नशा और नकदी बरामद     पटना - मंत्री जी तो बहुत कुछ बोल गए, अब कैसे डिफेंड करेंगे नीतीश कुमार? फ्रंटफुट पर आई RJD     बदायूं - कमरे में फंदे पर लटके मिले दंपती के शव, बड़ा भाई पत्नी सहित फरार; मायका पक्ष ने लगाया हत्या का आरोप     नई दिल्ली। - गलवान में चीनी सैनिकों से झड़प के बाद निभाई थी अहम भूमिका, अब संभाला विदेश सचिव का जिम्मा; आखिर क्यों खास है विक्रम मिसरी की नियुक्ति    

अंकु जी
  • 151168597 - RAJESH SHIVHARE 1



अंकु जी।       Fast news India 

1 साल बड़ी थीं आप मुझसे! जूनियर था मैं आपका, पर आपने अपने रँग में रँगकर ऐसा बना दिया कि कभी लगा ही नहीं कि हम आपके जूनियर हैं! मुझे याद आता है वो 2015 का समय, जब बीएचयू के आर्ट्स विभाग के सामने लाइन में खड़े होकर हम एडमिट कार्ड लेने के लिए संघर्ष कर रहे थे कि तभी आप आईं और हाथ पकड़कर कहा....

 

"इहाँ लगे रहोगे तो मर जाओगे दुपहरिया में! चलो मेरे साथ!" 

 

मैं हड़बड़ा गया! बिना जान पहचान के लड़की साथ चलकर एडमिट कार्ड दिलवाने का ऑफर दे रही थी! लाइन छोड़ते और काम न होता तो फिर पीछे से आकर लाइन लगना पड़ता! रिस्क था, पर वो लाइन की धक्कामुक्की झेली नहीं जा रही थी! 

 

आखिरकार मैं आपके साथ गया! आप सीधे ऑफिस ले गई और पाँच मिनट में एडमिट कार्ड दिलवा दिया!

 

मैंने कौतूहल से आपको देखा! आप समझ गईं और आपने कहा...

 

"जाओ गुरु!मौज करो! इतनी तो चलती है अपनी यहाँ!"

 

मैंने थैंक यू कहा और चलने को हुआ कि तभी फिर से आपकी आवाज चहकी...." और भी कोई काम हो तो बताना! करवा देंगे! पर अगली बार से टैक्स लगेगा!"

 

हमने कहा...."पर हम आपको खोजेंगे कैसे?"

 

आप बोली...."नम्बर नोट करो.....नाइन नाइन फाइव फाइव....."

 

अजीब संयोग था! आपने काम इतनी जल्दी करवा दिया और फिर खुद ही बिन मांगे नमबर भी दे रही थीं! न जाने किसका मुंह देखकर उठे थे हम!

 

फिर क्या था! आपका नम्बर हमने बाबा का प्रसाद समझकर लपक लिया! फिर से धन्यवाद कहा और चलने को हुआ कि फिर आप बोलीं....

 

"नाम नहीं बताओगे गुरु....."

 

"सिद्धार्थ"......" मैंने कहा...."और आपका?"

 

"अंकु......"

 

मैंने दोहराया....."अंकु ! सिद्धार्थ ! अंकु जी!"

 

"थोड़े फट्टू हो....पर प्यारे हो!"

 

उस दिन आपके ये आखिरी शब्द, बार बार कानो में गूंजते रहे!

 

फिर क्या था! उसी दिन से आप मेरी विधि जी बन गईं और शुरू हुआ रोमिंग वाले पैक डलवा डलवाकर देर देर तक बतियाने का सिलसिला, क्योंकि गुरु! उस जमाने मे जिओ वाली क्रांति नहीं आई थी अभी!

 

शाम के नाश्ते का पैसा भले रिचार्ज में चला जाता था, पर आपसे बतिया कर ही पेट भर जाता था!

 

मैं बनारस में नया था और आप पकिया बनारसी थीं!

 

आपने ही पहली बार घाट घाट , मंदिर मंदिर घुमाया हमे! पहलवान की लस्सी से पप्पू की चाय तक, सब आपने ही पिलाया हमे! 

 

कोई औपचारिकता नहीं रही हमदोनो के बीच में और अब आप रुम पर भी धड़ल्ले से आने जाने लगीं! मोहल्ले वाले भी पहचान गए थे आपको!

 

 आप स्कूटी से आतीं, दुप्पटा उतारती और क्या बनारसी स्वैग से धड़ढडाते हुए रूम में घुस जातीं! बाकी कमरों के लड़के मुझसे कहते ......

 

"यार ये तुम्हारी विधि जी बताकर नहीं आ सकती क्या! तनी काबू में रखो यार! ई गर्मी में हमलोग नँगे धड़ंगे लेटे रहते हैं, तबतक देवी जी तड़ाक से पहुच जाती हैं और लग जाती है हम सब की इज्ज़त की लंका!"

 

अब उन्हें कौन समझाता कि जिसके पास समूचे बनारस को काबू करने की शक्ति है, उन्हें हम भला क्या काबू करेंगे!

 

खूबसूरत थे वो दिन! कभी लंका, कभी बीएचयू, कभी अस्सी तो कभी काशी विश्वनाथ!आपके साथ घूमना, और कुल्हड़ वाली चाय पीने का स्वाद आजतक जेहन में ताजा है!

 

पर जानती हैं! सबसे ज्यादा ताजी है याद उस फिल्म की, जिसे हमलोगों ने साथ देखा था!

 

मसान फ़िल्म आई थी उस वक़्त और मैंने ट्रेलर में "तू किसी रेल सी गुजरती है" वाली लाइन सुनकर ही इरादा कर लिया था कि अंकु जी के साथ देखने जाएंगे आईपी मॉल में!

 

जिस दिन देखने जाना था, उस दिन आप बहुत पहले ही रूम पर पहुँच गई और जब आपने किताबें और सारा सामान इधर उधर बिखरा देखा तो पहले तो खूब क्लास लगाई और फिर खुद ही सरियाने लगीं!

 

मेरा बिस्तर, किताबें, टेबल....सबकुछ ठीक किया आपने! हम मदद करने जाते, तो आप डांट देती, फिर हम ठंडा जाते!

 

खैर हम फ़िल्म देखने गए! दीपक और शालू की कहानी चल रही थी!

 

जब शालू की शायरी सुनने के बाद दीपक कुछ समझ नहीं पाता है और सर खुजलाते हुए बोलता है कि ..."अच्छा था...मगर, वो....समझ नहीं आया....." और इसपर शालू कहती है....

 

"आप न एकदम बुद्धू हैं! पर अच्छे वाले बुद्धू हैं!"

 

ये सुनकर आप बोलीं..."देख लो! ये तुम्ही हो!"

 

"तू किसी रेल सी गुजरती है......" वाला गाना आया और मैं गाना कम, आपको इमोशनल होते हुए ज्यादा देख रहा था!

 

दीपक का शालू को रिक्वेस्ट भेजना!

 

"छोटी हो....इसलिए प्यार आ गया".....वाला सीन.... सबकुछ आता गया, बीतता गया और मैंने महसूस किया कि आपकी उंगलियां मेरी उंगलियों से जुड़ गई हैं और न जाने कब आपका सर मेरे कंधे पर झुक गया है!

 

कहानी बढ़ती रही और फिर अचानक, कहानी में ऐसा मोड़ आया जब लगा कि उस एक क्षण में कलेजे के हजार टुकड़े हो गए!

 

वह मोड़ था, जब शालू की मौत हो जाती है और उसके शव में दीपक को उसकी अंगूठी मिलती है....फिर उसे ही अपनी प्रेमिका का शव जलाना पड़ता है! 

 

"ई साला दुख कभी खत्म काहे नहीं होता बे......" कहकर फ़िल्म में जितना दीपक रोया, उससे ज्यादा कही हमदोनो रोए!

 

हमारी उंगलियां जुड़ी थीं, आंखे भरी थीं, आवाज में सिसकी भरी थी! हम दोनों चुप थे! निःशब्द थे!

 

दीपक ने शालू की अंगूठी पहले गंगा जी में फेंकी और फिर खुद ही उसे खोजने के लिए कूद पड़ा.....और जब बैकग्राउंड में फिर से कलेजा काटने वाला गाना बजा.....

 

"मन कस्तूरी रे, जग दस्तूरी रे....

 बात हुई ना........पूरी रे!"

 

उस सीन पर आपको लगा कि मैंने सुना नहीं, पर मैने आपकी सिसकी सुन ली थी और आपने भी मेरी भरी हुई आंखे देख ली थीं!

 

हमदोनो ने डबडबाई आंखों से एक दूसरे को देखा!

 

मैंने आपको हरदम बिंदास लड़की की तरह देखा था! मै सोच भी नहीं सकता था कि आप रोती भी होंगी!

 

पर उस शाम, आईपी मॉल के अंधेरे में भी आपके आंसू दिखाई दे गए मुझे!

 

आपको रोते देखकर मेरे सब्र का बांध भी टूट गया और मैं भी बिलख कर रो पड़ा! फिर आपने अपनी बाहें फैलाई और मुझे गले लगा लिया!

 

जब सीन बदला, तभी हमदोनो आलिंगन से अलग हुए!

 

इतने दिन से साथ थे हमलोग.... पर आपका आलिंगन पहली बार मिल रहा था मुझे! बहुत सुकून था उस गले लगने में! 

 

फ़िल्म के आखिर में, जबतक उस बच्चे को अंगूठी मिलती है, पंडित जी का कर्ज पूरा होता है और दीपक और देवी प्रयाग में मिलते हैं.....उस सीन के आते आते भावनाओं का शांत पड़ा ज्वर एक बार फिर उफान पर आ गया!

 

एक दूसरे की हाथों में फँसी उंगलियों पर हमारी जकड़ और मजबूत हो गई! इस बार मैंने अपना सर आपके कंधे पर लुढ़का दिया और ......इस लाइन के साथ फ़िल्म खत्म हुई....

 

"कहते हैं संगम दो बार जरूर आना चाहिए! एक बार अकेले और एक बार किसी के साथ!"

 

इस लाइन के आते आते हमारे हृदयों का भी संगम हो चुका था!

 

फ़िल्म खत्म हो गई थी! पर मन अब भी शालू और दीपक में डूबा हुआ था! 

 

अब भी आप गुमसुम थीं! मैंने हाथ बढ़ाकर उठाया आपको और आपकी उदासी देखते हुए, बाइक मैं खुद चलाकर आपके हॉस्टल तक गया!

 

उस पूरे रास्ते, आपने मुझे भी वैसे ही पकड़ रखा था जैसे मसान के एक सीन में शालू ने दीपक को!

 

"अंकु जी...."

 

"हाँ...."

 

"कुछ बोलिए न....."

 

"तुम तो मुझे शालू की तरह अचानक छोड़कर नहीं जाओगे न....?"

 

"कभी नहीं!"

 

और फिर मैंने महसूस किया कि आपने मेरी कमर को और जोर से पकड़ लिया है!

 

************

अंकु जी! आज आप भले ही हमसे दूर हैं! पर सच कहूं तो जीवन जीने की विधि उस शाम आप और उस फिल्म ने मिलकर मुझे सिखाई और आप चाहें कही भी हों, आप मेरे दिल में उसी तरह सुरक्षित हैं जैसे शालू के सुनाए शेर में....चिराग आंखों में महफूज रहते हैं!

 

और आज भी जब आपकी यादें रेल सी गुजरती हैं, तो ये दिल पुल सा थरथरातथरथरात

 

 Rajesh Shivhare country incharge magazine 

 

 


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